डॉ. कृष्ण कुमार झा
किसी भाषा की असली ताकत इस बात में नहीं होती कि उसे कितने लोग बोलते हैं, बल्कि इस बात में होती है कि कितने लोग उसे अपनी अगली पीढ़ी तक पहुंचाने की जिम्मेदारी महसूस करते हैं। मॉरीशस में हिंदी को देखते हुए यह बात और गहराई से समझ में आती है। यहां हिंदी केवल भारत से आई हुई एक भाषा नहीं है; यह उन पीढ़ियों की स्मृति का हिस्सा है, जिन्होंने समुद्र पार आकर अपने साथ भाषा, साहित्य, गीत, परंपराएं और सांस्कृतिक पहचान भी बचाकर रखी।
इसलिए मॉरीशस में हिंदी दिवस हमारे लिए किसी एक दिन का आयोजन नहीं, बल्कि अपनी जड़ों और अपनी आने वाली पीढ़ी के बीच संवाद का अवसर है। शायद यही वजह है कि यहां सितंबर आते ही हिंदी का वातावरण बदलने लगता है। महात्मा गांधी संस्थान में विद्यार्थियों के नुक्कड़ नाटक से लेकर कविता, भाषण, पोस्टर और अंताक्षरी तक की गतिविधियां केवल प्रतियोगिताएं नहीं हैं। इनके पीछे एक बड़ा सवाल है; हम अपनी भाषा को अगली पीढ़ी के लिए किस रूप में छोड़ना चाहते हैं? केवल पाठ्यक्रम की भाषा के रूप में या ऐसी भाषा के रूप में जिसमें वह अपनी कल्पना, अपनी संवेदना और अपने समय की कहानी कह सके?
3 सितंबर से महात्मा गांधी संस्थान में शुरू हुई हिंदी सप्ताह की गतिविधियां 11 सितंबर तक चलीं और 23 सितंबर को पुरस्कार वितरण समारोह के साथ उनका औपचारिक समापन होगा। लेकिन मॉरीशस में हिंदी का यह उत्सव किसी एक सप्ताह या एक दिन तक सीमित नहीं है। यहां हिंदी भाषा, संस्कृति, साहित्य और पहचान के साथ जुड़ी एक जीवंत परंपरा है।
इन आयोजनों की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यही है कि इनके केंद्र में नई पीढ़ी है। भाषा तभी जीवित रहती है, जब अगली पीढ़ी उसे केवल पाठ्यक्रम में नहीं, बल्कि अपने विचार, रचनात्मकता और रोजमर्रा के सांस्कृतिक जीवन में भी इस्तेमाल करे।
मॉरीशस में हिंदी की कहानी केवल भाषा की कहानी नहीं है। यह प्रवासी भारतीयों की स्मृति, सांस्कृतिक अस्मिता और सामाजिक यात्रा से जुड़ी हुई है। भारतीय मूल के लोगों के संगठनों और सामाजिक गतिविधियों में हिंदी ने लंबे समय तक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। बइठका (शाम को हिंदी सीखने की नियमित कक्षा) जैसी परंपराओं ने भी भाषा और सामुदायिक जीवन को जोड़ने का काम किया।
आज परिस्थितियां बदल चुकी हैं, लेकिन हिंदी अब भी भारतीय मूल के लोगों के लिए अपनी सांस्कृतिक विरासत को समझने और अगली पीढ़ी तक पहुंचाने का एक महत्वपूर्ण माध्यम है। इसी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संदर्भ में विश्व हिंदी सचिवालय की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है।
मॉरीशस में स्थित यह संस्थान हिंदी को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बढ़ावा देने के उद्देश्य से काम करता है। इस वर्ष 8 सितंबर को विश्व हिंदी सचिवालय में हिंदी दिवस के कार्यक्रम का शुभारंभ हुआ। भारतीय उच्चायुक्त श्री अनुराग श्रीवास्तव, जो वर्तमान में विश्व हिंदी सचिवालय के कार्यवाहक महासचिव की जिम्मेदारी भी संभाल रहे हैं, ने हिंदी दिवस का उद्घाटन किया और स्वागत भाषण दिया।
समारोह में मॉरीशस के शिक्षा मंत्री डॉ. महेंद्र गंगाप्रसाद विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। बुल्गारिया के सोफिया विश्वविद्यालय के संस्कृत, इंडोलॉजी और भाषा अध्ययन विभाग की प्रोफेसर रुसेवा तथा डॉ. मोना कौशिक भी विशेष अतिथि के रूप में शामिल हुईं।
कार्यक्रम का आरंभ डॉ. हरिवंश राय बच्चन की प्रसिद्ध कृति ‘मधुशाला’ के गायन से हुआ। विश्वभर के प्रतिभागियों के लिए आयोजित प्रतियोगिता के विजेताओं की घोषणा भी की गई। प्रतियोगिता का विषय प्रेमचंद की किसी कहानी की मूल शिक्षा पर दो मित्रों के बीच बातचीत था।
प्रेमचंद और बच्चन जैसे साहित्यकारों को हिंदी के अंतरराष्ट्रीय आयोजनों से जोड़ना यह बताता है कि हिंदी का वैश्विक स्वरूप केवल भाषा सीखने तक सीमित नहीं है; उसके साथ एक समृद्ध साहित्यिक और सांस्कृतिक संसार भी जुड़ा हुआ है।
इस पूरे आयोजन का सबसे आकर्षक पक्ष रहा राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, दिल्ली के प्रोफेसरों द्वारा आयोजित नाट्य कार्यशाला। प्रोफेसर अजय कुमार और प्रोफेसर बोस ने भारतीय और पाश्चात्य रंगमंच की विशेषताओं पर प्रकाश डाला। 9 सितंबर को इंदिरा गांधी सांस्कृतिक केंद्र में राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के प्रोफेसरों ने एकल अभिनय की प्रस्तुति भी दी। प्रोफेसर अजय कुमार का एकल अभिनय दर्शकों के लिए विशेष आकर्षण रहा।
मॉरीशस में हिंदी रंगमंच के लिए इस तरह की पहल का महत्व सामान्य सांस्कृतिक कार्यक्रम से कहीं अधिक है। रंगमंच भाषा को जीवंत बनाता है। मंच पर बोली जाने वाली भाषा में साहित्य के साथ अभिनय, संवाद, भाव और दर्शकों की तत्काल प्रतिक्रिया जुड़ जाती है। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के विशेषज्ञों की कार्यशाला और प्रस्तुतियां मॉरीशस के स्थानीय कलाकारों और विद्यार्थियों को रंगमंच की नई तकनीकों और दृष्टिकोणों से परिचित कराने का अवसर देती हैं। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि ऐसी पहल मॉरीशस में हिंदी रंगमंच को नई ऊर्जा दे सकती है।
मॉरीशस में हिंदी की भूमिका को केवल सांस्कृतिक पहचान तक सीमित करके भी नहीं देखा जा सकता। हिंदी यहां राजनीतिक चेतना के संचार की भाषा भी रही है और अप्रवासी भारतीयों के संगठनों की मजबूत आधारशिला भी। इसलिए आज जब हिंदी दिवस के अवसर पर विद्यार्थी मंच पर अभिनय करते हैं या कविता सुनाते हैं, तो उनके पीछे एक लंबी ऐतिहासिक यात्रा भी दिखाई देती है।
भारतीय उच्चायोग और विश्व हिंदी सचिवालय इस पूरी यात्रा को संस्थागत आधार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। हिंदी और भारतीय संस्कृति से जुड़े कार्यक्रमों के जरिए भारत और मॉरीशस के बीच के सांस्कृतिक रिश्ते लगातार गहरे हो रहे हैं।
मॉरीशस में हिंदी केवल एक भाषा नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन की एक जीवंत कड़ी है। बइठका संस्कृति में हिंदी का प्रयोग इसका एक महत्वपूर्ण उदाहरण है। इस पर भारतीय उच्चायुक्त का जोर यह बताता है कि भाषा को समाज की रोजमर्रा की सांस्कृतिक परंपराओं से जोड़कर ही उसकी जड़ों को मजबूत किया जा सकता है।
बइठका संस्कृति को अधिक प्रभावी बनाने के लिए भारतीय उच्चायोग की ओर से हाल में शुरू किया गया सहयोग भी इसी दिशा में एक सार्थक कदम है। इसी क्रम में मॉरीशस के शिक्षा मंत्री की ओर से हिंदी शिक्षा को लेकर उठाया गया सवाल भी गंभीरता से विचार करने की मांग करता है।
हिंदी को नई पीढ़ी तक पहुंचाना है तो उसके शिक्षण को सरल, सहज और बच्चों की रुचि के अनुरूप बनाना होगा। यह बात केवल मॉरीशस तक सीमित नहीं है। हिंदी के वैश्विक भविष्य का सवाल भी आखिरकार इसी से जुड़ा है।
आज किसी भाषा की ताकत केवल इस बात से तय नहीं होती कि उसे कितने लोग बोलते हैं; यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि नई पीढ़ी उसे कितनी सहजता से अपनाती है और अपने जीवन की भाषा बनाती है।
डिजिटल युग ने भाषा के सामने नई चुनौतियां जरूर खड़ी की हैं, लेकिन नई संभावनाओं के दरवाजे भी खोले हैं। हिंदी को वैश्विक भाषा के रूप में आगे बढ़ना है तो उसे साहित्य और इतिहास की अपनी समृद्ध विरासत के साथ शिक्षा, तकनीक, डिजिटल माध्यम, कला, संचार और बदलती जीवन-शैली में भी अपनी जगह लगातार मजबूत करनी होगी।








































