सितंबर में बढ़ी निकासी: भारतीय शेयर बाजार में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों की खरीदारी का रुख एक बार फिर कमजोर पड़ा है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, सितंबर 2026 में 18 सितंबर तक विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों ने भारतीय शेयरों से 20,974 करोड़ रुपये की शुद्ध निकासी की है। इसके पीछे वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता, अमेरिका में ऊंची ब्याज दरें और बॉन्ड प्रतिफल, कच्चे तेल की महंगी कीमतें तथा भारतीय रुपये में कमजोरी जैसे कई कारक बताए जा रहे हैं। यह बदलाव इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे ठीक पहले जुलाई और अगस्त में विदेशी निवेशकों ने भारतीय शेयर बाजार में शुद्ध निवेश किया था। केंद्रीय निक्षेपागार सेवा के आंकड़ों के मुताबिक जुलाई में 20,200 करोड़ रुपये और अगस्त में 29,630 करोड़ रुपये का निवेश हुआ था। सितंबर की बिकवाली ने पिछले दो महीनों की खरीदारी के बाद विदेशी निवेशकों के रुख में फिर बदलाव को सामने ला दिया है।
2026 में निकासी का बड़ा आंकड़ा: सितंबर की बिकवाली को जोड़ने के बाद वर्ष 2026 में अब तक विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों की भारतीय शेयरों से कुल निकासी करीब 2.45 लाख करोड़ रुपये हो गई है। यह आंकड़ा पूरे वर्ष 2025 में हुई 1.66 लाख करोड़ रुपये की निकासी से भी अधिक है। यानी इस वर्ष विदेशी निवेशकों की शुद्ध बिकवाली का आंकड़ा पिछले पूरे वर्ष के स्तर को पार कर चुका है। हालांकि, शेयर बाजार के प्राथमिक बाजार में विदेशी निवेशकों की भागीदारी पूरी तरह बंद नहीं हुई है और इस अवधि में सार्वजनिक निर्गमों तथा अन्य प्राथमिक बाजार गतिविधियों के माध्यम से उनका निवेश जारी रहा है। इससे यह संकेत मिलता है कि विदेशी पूंजी का रुख केवल भारतीय परिसंपत्तियों से पूरी तरह बाहर निकलने जैसा नहीं है, बल्कि बाजार के अलग-अलग हिस्सों में निवेश का तरीका भी बदल रहा है।
जुलाई और अगस्त में बदला था रुख: वर्ष के शुरुआती महीनों में विदेशी निवेशकों की बिकवाली के बीच जुलाई और अगस्त में तस्वीर कुछ समय के लिए बदली थी। जुलाई 2026 में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों ने भारतीय शेयरों में 20,200 करोड़ रुपये का निवेश किया, जबकि अगस्त में यह आंकड़ा 29,630 करोड़ रुपये रहा। यानी इन दोनों महीनों में मिलाकर करीब 49,830 करोड़ रुपये की खरीदारी हुई थी। सितंबर में फिर बिकवाली शुरू होने से बाजार में विदेशी पूंजी के प्रवाह को लेकर अनिश्चितता बढ़ी है। हालांकि, केवल एफपीआई की खरीद-बिक्री को देखकर भारतीय शेयर बाजार की पूरी दिशा तय नहीं की जा सकती, क्योंकि घरेलू संस्थागत निवेश, कंपनियों के वित्तीय परिणाम, ब्याज दरें, आर्थिक वृद्धि और वैश्विक बाजारों की स्थिति भी शेयर कीमतों को प्रभावित करती हैं।
अमेरिका की ऊंची ब्याज दरों का असर: विदेशी निवेशकों की हालिया बिकवाली के प्रमुख कारणों में अमेरिका की ब्याज दर और बॉन्ड प्रतिफल को भी बताया गया है। उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार अमेरिकी फेडरल रिजर्व की दर 3.75 से 4 प्रतिशत के स्तर पर थी। जब अमेरिका में ब्याज दरें और बॉन्ड प्रतिफल अपेक्षाकृत ऊंचे रहते हैं, तो वैश्विक निवेशकों के लिए अमेरिकी परिसंपत्तियों का आकर्षण बढ़ सकता है। साथ ही भारत और अमेरिका के बीच ब्याज दर का अंतर कम होने पर भारतीय परिसंपत्तियों से मिलने वाला अपेक्षाकृत अतिरिक्त प्रतिफल विदेशी निवेशकों को पहले की तुलना में कम आकर्षक लग सकता है। चॉइस वेल्थ के मुख्य निवेश रणनीति अधिकारी धीरज गौड़ ने भी ऊंची अमेरिकी दरों और प्रतिफल को हालिया एफपीआई बिकवाली के प्रमुख कारकों में शामिल किया है।
महंगा कच्चा तेल बढ़ा रहा दबाव: कच्चे तेल की कीमतों में तेजी भी भारतीय बाजार के लिए महत्वपूर्ण चिंता का विषय बनी हुई है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार ब्रेंट कच्चा तेल 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बना हुआ था। पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव ने तेल की कीमतों को लेकर चिंता और बढ़ाई है। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के एक बड़े हिस्से के लिए आयात पर निर्भर है, इसलिए कच्चे तेल की कीमत लंबे समय तक ऊंची रहने पर देश के आयात बिल और महंगाई पर दबाव बढ़ सकता है। इसी वजह से महंगे तेल का असर केवल ऊर्जा क्षेत्र तक सीमित नहीं रहता, बल्कि रुपये, मुद्रास्फीति, कंपनियों की लागत और व्यापक निवेश धारणा तक पहुंच सकता है। चॉइस वेल्थ के धीरज गौड़ ने भी भू-राजनीतिक तनाव के बीच ऊंची कच्चे तेल की कीमतों को विदेशी निवेशकों की बिकवाली के प्रमुख कारणों में गिना है।
रुपये की कमजोरी बनी तीसरी बड़ी वजह: भारतीय मुद्रा पर बढ़ता दबाव भी विदेशी निवेशकों के लिए महत्वपूर्ण कारक है। रिपोर्ट के अनुसार संबंधित सप्ताह में रुपये में 1.1 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई, जो चार महीने में उसकी सबसे बड़ी साप्ताहिक गिरावट थी। रुपया कारोबार के दौरान 96 रुपये प्रति डॉलर के स्तर को भी पार कर गया और करीब 95.92 से 95.96 रुपये प्रति डॉलर के रिकॉर्ड निचले स्तर के आसपास कारोबार करता रहा। विदेशी निवेशक जब भारतीय शेयरों में पैसा लगाते हैं, तो उन्हें केवल शेयर के मूल्य में बदलाव ही नहीं, बल्कि मुद्रा विनिमय दर में होने वाले उतार-चढ़ाव का भी सामना करना पड़ता है। रुपये में तेज कमजोरी होने पर डॉलर के आधार पर मिलने वाला रिटर्न प्रभावित हो सकता है। इसलिए कमजोर रुपया भी विदेशी पूंजी के प्रवाह पर दबाव डालने वाला एक महत्वपूर्ण कारक बन सकता है।
डेट बाजार से भी निकासी: विदेशी निवेशकों की बिकवाली केवल शेयर बाजार तक सीमित नहीं रही। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार उन्होंने भारतीय ऋण बाजार में भी अलग-अलग निवेश मार्गों के माध्यम से निकासी की। पूर्ण पहुंच मार्ग के जरिए 10,296 करोड़ रुपये, स्वैच्छिक प्रतिधारण मार्ग के तहत 1,817 करोड़ रुपये और सामान्य मार्ग से 1,068 करोड़ रुपये की निकासी दर्ज की गई। इससे पता चलता है कि संबंधित अवधि में विदेशी निवेशकों की सावधानी का असर इक्विटी के साथ-साथ ऋण प्रतिभूतियों पर भी दिखाई दिया। हालांकि, अलग-अलग निवेश मार्गों के आंकड़े अलग-अलग होते हैं और उनका अर्थ समझते समय संबंधित नियामकीय ढांचे तथा निवेश अवधि को भी ध्यान में रखना जरूरी है।
भू-राजनीतिक तनाव से बढ़ी अनिश्चितता: पश्चिम एशिया में जारी तनाव ने कच्चे तेल और वैश्विक बाजारों को लेकर अनिश्चितता बढ़ाई है। विदेशी निवेशक ऐसे माहौल में जोखिम वाली परिसंपत्तियों के प्रति अधिक सतर्क रुख अपना सकते हैं। उपलब्ध विश्लेषण में यह भी कहा गया है कि आगे विदेशी पूंजी का प्रवाह ईरान और अमेरिका के बीच जारी टकराव तथा उससे कच्चे तेल की कीमतों पर पड़ने वाले प्रभाव से प्रभावित हो सकता है। महंगा तेल और ऊंचे अमेरिकी बॉन्ड प्रतिफल उभरते बाजारों में निवेश के माहौल को प्रभावित करने वाले कारक बने हुए हैं। वहीं, कुछ बाजार विश्लेषकों ने भारतीय अर्थव्यवस्था की मजबूती और भविष्य में बेहतर कंपनियों की आय वृद्धि को सकारात्मक पक्ष के रूप में भी रेखांकित किया है। इसलिए एफपीआई निकासी के आंकड़ों को बाजार की पूरी तस्वीर के बजाय मौजूदा वैश्विक और घरेलू परिस्थितियों के एक महत्वपूर्ण संकेतक के रूप में देखना अधिक उचित होगा।
बाजार के लिए क्या मायने: विदेशी निवेशकों की लगातार बिकवाली से बाजार में उतार-चढ़ाव बढ़ सकता है, खासकर तब जब वैश्विक स्तर पर अमेरिकी ब्याज दरें, कच्चे तेल की कीमतें और मुद्रा बाजार तेजी से बदल रहे हों। दूसरी ओर, भारतीय बाजार में घरेलू निवेशकों की भागीदारी और कंपनियों के कारोबार तथा आय से जुड़े आंकड़े भी बाजार की दिशा को प्रभावित करते हैं। इसलिए सितंबर में 20,974 करोड़ रुपये की एफपीआई निकासी को एक महत्वपूर्ण बाजार घटना के रूप में देखा जा रहा है, लेकिन इसे अकेले भारतीय शेयर बाजार की आगे की दिशा का निश्चित संकेत नहीं माना जा सकता। फिलहाल विदेशी निवेशकों के रुख पर अमेरिकी बॉन्ड प्रतिफल, कच्चे तेल की कीमत, रुपये की विनिमय दर, वैश्विक भू-राजनीतिक घटनाक्रम और भारतीय कंपनियों की आय जैसे कई कारकों की निगरानी बनी हुई है।














































