अहोई अष्टमी का महत्व और व्रत का उद्देश्य: कार्तिक कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को अहोई अष्टमी का व्रत रखा जाता है। इस दिन माताएं अपनी संतान की लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य, सुखी जीवन, खुशहाली और करियर में सफलता की कामना से अहोई माता की पूजा करती हैं। संतान के जीवन में धन-धान्य और समृद्धि बनाए रखने के साथ ही संतान प्राप्ति की इच्छा रखने वाली महिलाएं भी यह व्रत करती हैं। पूरे दिन उपवास रखने के बाद शाम को तारों को अर्घ्य देकर व्रत का पारण किया जाता है। कुछ महिलाएं अपनी पारिवारिक परंपरा और मान्यता के अनुसार चंद्रमा को अर्घ्य देकर भी व्रत खोलती हैं। वर्ष 2026 में अहोई अष्टमी की पूजा का मुहूर्त शाम 5:36 बजे से 6:54 बजे तक है। इस दिन चंद्रोदय रात 8:40 बजे होगा, जबकि तारों को देखने का सांझ का समय शाम 6:00 बजे निर्धारित है।
अहोई अष्टमी पूजा विधि और पूजन सामग्री: व्रत के दिन सुबह स्नान करके स्वच्छ कपड़े पहनें और संतान की लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य तथा सुखी जीवन की कामना के साथ अहोई माता के व्रत का संकल्प लें। इसके बाद घर की उत्तर-पूर्व दिशा को साफ करके लकड़ी की चौकी पर लाल कपड़ा बिछाएं और अहोई माता की तस्वीर स्थापित करें। परंपरा के अनुसार कुछ महिलाएं दीवार पर गेरू से अहोई माता का चित्र भी बनाती हैं, जिसमें माता के साथ सूर्य, तारे, बच्चों और पशुओं के चित्र बनाए जाते हैं। कई परिवारों में चांदी की अहोई बनवाने की परंपरा है। इसे चांदी की गोलियों के साथ धागे में पिरोकर पूजा के समय गले में पहना जाता है। इसे स्थानीय भाषा में स्याहु कहा जाता है। चौकी की उत्तर दिशा में जमीन को गोबर से लीपकर वहां जल से भरा कलश रखें और उसमें थोड़े चावल डाल दें। कलश पर कलावा बांधें और रोली का तिलक लगाएं। इसके बाद अहोई माता को भी रोली और चावल का तिलक करें। माता को 8 पूड़ियां या 8 मीठे पूए अर्पित करें। आठ की संख्या में भोग लगाने की परंपरा के कारण इसे अठवारी कहा जाता है। पूजा में चावल से भरी कटोरी, मूली और सिंघाड़े भी रखें। दीपक जलाकर अहोई माता की आरती करें और व्रत कथा का पाठ करें। कथा सुनते समय दाहिने हाथ में कुछ चावल रखें और कथा पूरी होने के बाद उन्हें साड़ी या चुनरी के पल्ले में गांठ बांधकर सुरक्षित रख लें।
अहोई अष्टमी 2026 पूजा मुहूर्त और अर्घ्य का समय: वर्ष 2026 में अष्टमी तिथि 1 नवंबर को दोपहर 2:51 बजे शुरू होगी और 2 नवंबर को दोपहर 1:10 बजे समाप्त होगी। अहोई माता की पूजा के लिए शुभ समय 1 नवंबर को शाम 5:36 बजे से 6:54 बजे तक रहेगा। तारों को देखने के लिए सांझ का समय शाम 6:00 बजे बताया गया है। व्रत रखने वाली महिलाएं शाम को पूजा के बाद पल्ले में बांधकर रखे चावलों को लेकर कलश के जल से अपनी मान्यता के अनुसार तारों या चंद्रमा को अर्घ्य दें। इस दिन चंद्रोदय रात 8:40 बजे होगा। अर्घ्य देने के बाद व्रत खोलने की परंपरा निभाई जाती है। पूजा में रखी चावल की कटोरी, मूली, सिंघाड़े, मीठे पूए या पूड़ियों सहित अन्य प्रसाद को ब्राह्मण के घर दान करने की परंपरा भी है। अहोई माता की तस्वीर को लेकर मान्यता है कि इसे दिवाली तक घर में स्थापित करके रखना चाहिए।
अहोई अष्टमी व्रत कथा और स्याहु का प्रसंग: पौराणिक कथा के अनुसार, एक साहूकार की बेटी दिवाली से पहले जंगल में मिट्टी खोदने गई थी। वहां अनजाने में उसकी खुरपी से स्याहु यानी साही का एक बच्चा घायल हो गया और उसकी मृत्यु हो गई। इस घटना से क्रोधित होकर स्याहु ने साहूकार की बेटी को उसकी कोख बंधने का श्राप दे दिया। साहूकार की बेटी ने अपनी भाभियों से विनती की कि वे उसके स्थान पर यह श्राप स्वीकार कर लें। ननद की परेशानी देखकर सबसे छोटी भाभी ने उसकी जगह यह संकट अपने ऊपर ले लिया। इसके बाद साही के श्राप के कारण छोटी भाभी की जो भी संतान होती, वह 7 दिन के भीतर मृत्यु को प्राप्त हो जाती। संतान को खोने के दुख से परेशान होकर छोटी भाभी ने एक पंडित से इसका उपाय पूछा। पंडित के बताए मार्ग पर चलते हुए उसने पूरी श्रद्धा से पहले सुरही गाय और फिर साही की सेवा की। उसकी निष्ठा और सेवा से प्रसन्न होकर साही ने उसे 7 पुत्रों और बहुओं का आशीर्वाद दिया। मान्यता है कि इसी घटना के बाद कार्तिक कृष्ण पक्ष की अष्टमी को अहोई माता यानी देवी पार्वती और स्याहु की पूजा करके संतान की लंबी आयु, सुख और रक्षा की कामना से व्रत रखने की परंपरा शुरू हुई।
अहोई अष्टमी व्रत के जरूरी नियम और सावधानियां: इस व्रत में कुछ विशेष नियमों का पालन करने की परंपरा है। मान्यता के अनुसार अहोई अष्टमी के दिन सुई-धागे का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए और सिलाई-कढ़ाई से बचना चाहिए। इस दिन चाकू या किसी अन्य नुकीली वस्तु से फल और सब्जियां काटने से भी परहेज किया जाता है। व्रत रखने वाली महिलाओं को तामसिक भोजन और अन्य तामसिक गतिविधियों से दूर रहना चाहिए। दिनभर क्रोध, वाद-विवाद और कटु वचन बोलने से बचें तथा घर के बड़े-बुजुर्गों का अपमान न करें। शाम को आसमान में तारे या चंद्रमा के दर्शन करने के बाद अपनी परंपरा के अनुसार अर्घ्य देकर ही जल ग्रहण करें। पूजा के दौरान संतान की सुख-समृद्धि और लंबी आयु की कामना करें। व्रत कथा सुनते समय दाहिने हाथ में चावल रखने और कथा पूरी होने पर उन्हें साड़ी या चुनरी के पल्ले में बांधने की परंपरा का भी पालन किया जाता है। पूजा के बाद प्रसाद और पूजन सामग्री का दान करें।
















































