रामपुर की प्रसिद्ध जौहर यूनिवर्सिटी के अड़तीस भवनों को ध्वस्तीकरण से बचाने के लिए कानूनी प्रक्रिया शुरू हो सकती है। विषय से जुड़े कानूनी जानकारों के अनुसार वर्तमान समय में आजम खान के सामने मुख्य रूप से तीन विकल्प मौजूद हैं। इन तीन प्रमुख कानूनी और प्रशासनिक विकल्पों का उपयोग करके ही इस प्रतिष्ठित संस्थान की इमारतों को बचाया जा सकता है। प्रशासन की इस कड़ी कार्रवाई के खिलाफ किसी भी कदम को उठाने से पहले इन विकल्पों का गहन अध्ययन किया जा रहा है। अब इन विकल्पों में से सही रास्ते का चुनाव करना ही यूनिवर्सिटी के भविष्य को पूरी तरह तय करेगा।
नियमितीकरण और भारी खर्च: जानकारों का कहना है कि यदि यूनिवर्सिटी प्रबंधन भवनों के नक्शे को नियमित कराने की कानूनी प्रक्रिया को अपनाता है। तो इस पूरी जटिल प्रशासनिक प्रक्रिया को पूरा करने में एक बहुत ही भारी-भरकम धनराशि का खर्च आ सकता है। विषय से जुड़े विभिन्न विशेषज्ञों के प्रारंभिक आकलन के अनुसार इस काम में सौ करोड़ रुपये से अधिक का खर्च हो सकता है। हालांकि यह कोई आधिकारिक सरकारी अनुमान नहीं है बल्कि इस क्षेत्र के जानकारों द्वारा लगाया गया एक संभावित आकलन है। इतनी बड़ी रकम का इंतजाम करना यूनिवर्सिटी प्रशासन के लिए इस समय एक बेहद बड़ी और कठिन चुनौती साबित होगा।
कंपाउंडिंग का पहला विकल्प: आजम खान के सामने मौजूद पहला व्यावहारिक विकल्प यह है कि वे रामपुर विकास प्राधिकरण से इन भवनों का नक्शा पास करवाएं। यूनिवर्सिटी की इन अड़तीस अवैध घोषित इमारतों के नक्शे को कंपाउंडिंग के माध्यम से वैध कराने की प्रक्रिया शुरू की जा सकती है। इसके लिए उन्हें विकास शुल्क, लेबर सेस, कंपाउंडिंग फीस और इम्पैक्ट फीस समेत कई तरह के सरकारी शुल्क चुकाने होंगे। इन सभी निर्धारित शुल्कों को पूरी तरह से जमा करने के बाद ही प्राधिकरण इन इमारतों को वैध घोषित कर सकता है। यह एक पूरी तरह से प्रशासनिक रास्ता है जो सीधे स्थानीय विकास प्राधिकरण के अधिकार क्षेत्र के अंतर्गत आता है।
हाईकोर्ट का दूसरा रास्ता: इस मामले में आजम खान के सामने मौजूद दूसरा बड़ा कानूनी विकल्प सीधे देश की उच्च अदालत का दरवाजा खटखटाना है। वे इस ध्वस्तीकरण नोटिस के खिलाफ सीधे हाईकोर्ट में एक रिट याचिका दायर करके इस कार्रवाई पर रोक लगाने की मांग कर सकते हैं। हालांकि इस विषय के कानूनी जानकारों का स्पष्ट कहना है कि अदालत से राहत मिलने के बाद भी मूल समस्या वही रहेगी। यदि भवनों के नक्शों को पूरी तरह से नियमित कराना होगा तो अंततः उन्हें स्थानीय प्रशासन के पास ही आना पड़ेगा। यह पूरी नियमितीकरण की विधिक प्रक्रिया अंत में रामपुर विकास प्राधिकरण के माध्यम से ही पूरी की जानी अनिवार्य होगी।
कमिशनर से राहत की अपील: तीसरा और अंतिम विकल्प यह है कि आजम खान मुरादाबाद मंडल के कमिश्नर आन्जनेय सिंह के समक्ष एक आवेदन प्रस्तुत करें। वे रामपुर विकास प्राधिकरण के अध्यक्ष के रूप में तैनात इस वरिष्ठ अधिकारी से मिलकर इस ध्वस्तीकरण आदेश पर रोक लगाने का अनुरोध करें। वे एक प्रार्थना पत्र देकर इस पूरी ध्वस्तीकरण की कार्रवाई को तत्काल रोकने के लिए प्रशासनिक राहत की गुहार लगा सकते हैं। यह विकल्प पूरी तरह से एक त्वरित प्रशासनिक राहत पाने का एक जरिया बन सकता है जिसे आजम खान आजमा सकते हैं। इस सीधे आवेदन के माध्यम से वे इस कानूनी लड़ाई के लिए थोड़ा और अतिरिक्त समय प्राप्त कर सकते हैं।
भविष्य पर टिकी नजरें: इस समय जौहर यूनिवर्सिटी के इस बेहद संवेदनशील और बड़े मामले को लेकर पूरे उत्तर प्रदेश में चर्चाओं का बाजार गर्म है। हर कोई इस बात को लेकर उत्सुक है कि आजम खान इन तीनों विकल्पों में से किस रास्ते को प्राथमिकता देते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार इन तीनों ही रास्तों में बहुत सारी प्रशासनिक अड़चनें और भारी वित्तीय खर्चे साफ तौर पर जुड़े हुए हैं। अब सबकी नजरें इस बात पर टिकी हैं कि इस मामले में आगे क्या प्रशासनिक और अंतिम कानूनी फैसला निकलकर सामने आता है। प्रशासन और अदालत के अगले कदमों से ही इस प्रसिद्ध यूनिवर्सिटी के अस्तित्व का अंतिम फैसला पूरी तरह हो पाएगा।


























































