नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने बुलडोजर एक्शन के खिलाफ तय किए गए दिशा-निर्देशों (गाइडलाइन्स) के उल्लंघन से जुड़ी अवमानना याचिकाओं पर सुनवाई करने से साफ इनकार कर दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इन शिकायतों को संबंधित राज्यों के हाई कोर्ट के समक्ष ही उठाया जाना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने क्यों लिया यह फैसला?
चीफ जस्टिस (CJI) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच ने सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद यह फैसला सुनाया। कोर्ट का कहना था:
- सभी याचिकाओं में अलग-अलग और उलझे हुए तथ्यात्मक विवाद शामिल हैं।
- प्रत्येक मामले के अलग-अलग तथ्यों और दावों पर सुप्रीम कोर्ट सीधे निर्णय नहीं दे सकता।
- बेहतर यही होगा कि सभी अवमानना याचिकाओं पर संबंधित हाई कोर्ट विचार करे।
क्या है पूरा मामला?
साल 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने ‘बुलडोजर जस्टिस’ को लेकर एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया था और तोड़फोड़ की कार्रवाई के लिए सख्त गाइडलाइन्स तय की थीं। याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि विभिन्न राज्य सरकारें इन नियमों का उल्लंघन करके अवैध रूप से बुलडोजर चला रही हैं, जिसके खिलाफ कोर्ट में कई अवमानना याचिकाएं दाखिल की गई थीं।
याचिकाकर्ताओं की ओर से दी गईं प्रमुख दलीलें
अदालत में वरिष्ठ वकीलों ने राज्य सरकारों की कार्रवाई पर गंभीर सवाल उठाए:
- ‘गंभीर उल्लंघनों’ पर दखल जरूरी: सोमनाथ में मस्जिदों को गिराए जाने के मामले में पेश हुए सीनियर एडवोकेट हुज़ेफ़ा अहमदी ने कहा कि कोर्ट को इन गंभीर उल्लंघनों पर संज्ञान लेना चाहिए। उन्होंने दावा किया कि वे महज 15 मिनट में सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के उल्लंघन को साबित कर सकते हैं।
- बदले की भावना से कार्रवाई: महाराष्ट्र के एक मामले में सीनियर एडवोकेट चंद्र उदय सिंह ने दलील दी कि कई मामलों में स्थानीय नेताओं के सार्वजनिक बयानों के तुरंत बाद बुलडोजर चला दिया जाता है। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार के हलफनामे ही यह साबित करने के लिए काफी हैं कि तय कानूनी प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया और यह कार्रवाई केवल ‘सजा देने’ के मकसद से की गई थी।

























































