ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में अमेरिका और उसके पश्चिमी सहयोगियों की एक ओर तथा रूस और चीन की दूसरी ओर अलग-अलग स्थिति सामने आई है। गुरुवार को अमेरिका ने ईरान पर प्रतिबंधों की निगरानी करने वाले संयुक्त राष्ट्र विशेषज्ञों के पैनल का कार्यकाल एक और वर्ष बढ़ाने का प्रस्ताव रखा, लेकिन रूस और चीन ने इसे वीटो कर दिया। मतदान के दौरान 11 देशों ने प्रस्ताव का समर्थन किया, जबकि रूस और चीन ने विरोध किया तथा पाकिस्तान और सोमालिया मतदान से दूर रहे। दो स्थायी सदस्यों के वीटो के चलते प्रस्ताव आगे नहीं बढ़ सका। यह घटनाक्रम ऐसे समय हुआ है जब ईरान के परमाणु कार्यक्रम और उसके अंतरराष्ट्रीय दायित्वों को लेकर पहले से ही गंभीर मतभेद बने हुए हैं।
विशेषज्ञ पैनल की भूमिका पर क्यों था जोर अमेरिकी प्रस्ताव का उद्देश्य उस विशेषज्ञ व्यवस्था को जारी रखना था, जिसे ईरान पर लागू संयुक्त राष्ट्र प्रतिबंधों के उल्लंघन की निगरानी और रिपोर्टिंग के लिए इस्तेमाल किया जाना था। अमेरिकी प्रतिनिधि जेनिफर लोसेटा ने कहा कि स्वतंत्र विशेषज्ञों की रिपोर्ट से सुरक्षा परिषद को प्रतिबंधों के उल्लंघन और प्रतिबंधित सहयोग के बारे में तथ्य आधारित जानकारी मिल सकती थी। अमेरिकी पक्ष के अनुसार, पैनल के समाप्त होने से निगरानी में एक अंतर पैदा होगा और ईरान से जुड़े प्रतिबंधों को दरकिनार करने वाली गतिविधियों की स्वतंत्र जांच कमजोर पड़ सकती है। हालांकि, ताजा घटनाक्रम में एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि विशेषज्ञों के पैनल को लेकर सदस्य देशों में पहले से सहमति नहीं बन पाई थी और विशेषज्ञों की नियुक्ति अटकी हुई थी।
रूस और चीन की आपत्ति का आधार क्या है रूस ने अमेरिकी प्रस्ताव का विरोध करते हुए कहा कि ईरान पर प्रतिबंधों की वापसी का आधार ही विवादित है। रूसी राजदूत वासिली नेबेंजिया के अनुसार, पश्चिमी देशों ने 2015 के परमाणु समझौते में मौजूद स्नैपबैक व्यवस्था के जरिए प्रतिबंध दोबारा लागू किए, जिसे रूस कानूनी रूप से मान्य नहीं मानता। चीन ने भी रूस के साथ मिलकर सुरक्षा परिषद में राजनीतिक टकराव बढ़ाने के बजाय ईरान के परमाणु मुद्दे के समाधान के लिए कूटनीतिक रास्ते पर जोर दिया है। रूस और चीन का यह रुख पश्चिमी देशों की उस स्थिति से अलग है, जिसके अनुसार ईरान पर संयुक्त राष्ट्र प्रतिबंध फिर लागू हो चुके हैं और उनका पालन सुनिश्चित करना जरूरी है।
प्रतिबंधों में क्या-क्या शामिल है ईरान पर लागू संयुक्त राष्ट्र प्रतिबंधों के तहत विदेशों में मौजूद कुछ ईरानी संपत्तियों को फ्रीज करने, हथियारों से संबंधित लेन-देन पर रोक लगाने और बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम से जुड़ी गतिविधियों पर प्रतिबंध जैसी व्यवस्थाएं हैं। इन प्रतिबंधों को सितंबर 2025 में फिर लागू किया गया था। फ्रांस, जर्मनी और ब्रिटेन ने 2015 के परमाणु समझौते में मौजूद स्नैपबैक व्यवस्था का इस्तेमाल किया था, जिसके बाद 27 सितंबर 2025 को पहले के संयुक्त राष्ट्र प्रतिबंध दोबारा प्रभावी हुए। इस व्यवस्था की वैधता को लेकर रूस और चीन तथा पश्चिमी देशों के बीच मतभेद बना हुआ है। इसी कानूनी विवाद का असर प्रतिबंधों की निगरानी करने वाली व्यवस्था पर भी पड़ा है।
440.9 किलो समृद्ध यूरेनियम का मुद्दा ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर चिंता केवल प्रतिबंधों की निगरानी तक सीमित नहीं है। अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी के आंकड़ों में ईरान के पास 440.9 किलोग्राम यूरेनियम को 60 प्रतिशत तक समृद्ध किए जाने का उल्लेख किया गया है। हथियार बनाने के लिए आम तौर पर करीब 90 प्रतिशत शुद्धता का स्तर बताया जाता है, इसलिए 60 प्रतिशत संवर्धन उस स्तर से नीचे है। फिर भी इतनी अधिक संवर्धन क्षमता और भंडार अंतरराष्ट्रीय चिंता का विषय बने हुए हैं। जून 2025 में ईरान के परमाणु ठिकानों पर इजरायल और अमेरिका की सैन्य कार्रवाई के बाद अंतरराष्ट्रीय निरीक्षक ईरान के समृद्ध यूरेनियम के मौजूदा भंडार की स्थिति की पूरी तरह पुष्टि नहीं कर पाए हैं। ईरान का कहना है कि उसका परमाणु कार्यक्रम हथियार बनाने के उद्देश्य से नहीं है।
ईरान ने वीटो का स्वागत किया, फ्रांस ने दूसरा रास्ता सुझाया रूस और चीन के वीटो के बाद ईरान के संयुक्त राष्ट्र मिशन ने दोनों देशों का आभार जताया और कहा कि उन्होंने अमेरिका तथा उसके सहयोगियों की राजनीतिक कोशिश को रोक दिया। वहीं फ्रांस ने प्रतिबंधों को आवश्यक बताते हुए संकेत दिया कि विशेषज्ञ पैनल की व्यवस्था समाप्त होने के बाद निगरानी के दूसरे तरीके तलाशे जा सकते हैं। फ्रांस, जर्मनी, ब्रिटेन और अमेरिका के बीच किसी वैकल्पिक निगरानी तंत्र पर सहयोग की संभावना इसी संदर्भ में सामने आई है। इससे पहले रूस के वीटो के कारण मार्च 2024 में उत्तर कोरिया के परमाणु कार्यक्रम पर नजर रखने वाला संयुक्त राष्ट्र विशेषज्ञ पैनल भी समाप्त हो गया था। ईरान के मामले में भी अब सुरक्षा परिषद के सामने चुनौती यह है कि प्रतिबंधों की स्थिति और उनके अनुपालन की निगरानी किस व्यवस्था के जरिए की जाएगी।












































