हरियाली तीज का पावन पर्व हिंदू धर्म में सुहागिन महिलाओं के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण और पवित्र माना जाता है। यह त्योहार नाग पंचमी से ठीक दो दिन पूर्व, श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जाता है। इस शुभ अवसर पर महिलाएं अपने पति की लंबी आयु, सुखी दांपत्य जीवन और मनोवांछित फल की प्राप्ति के लिए निर्जला व्रत रखती हैं। इस दिन सोलह श्रृंगार करके भगवान शिव और माता पार्वती की विधि-विधान से पूजा-अर्चना की जाती है। इस पर्व में हरे रंग का विशेष महत्व है, इसलिए महिलाएं हरे रंग के वस्त्र और हरी चूड़ियां धारण करती हैं। यह पावन पर्व पति-पत्नी के अनूठे प्रेम, अटूट विश्वास और समर्पण का प्रतीक है।
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इसी पावन तिथि पर माता पार्वती की कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें अपनी अर्धांगिनी के रूप में स्वीकार किया था। आइए विस्तार से जानते हैं हरियाली तीज की पावन पौराणिक कथा:
माता पार्वती का दृढ़ संकल्प और बाल्यकाल की अभिलाषा
हरियाली तीज की पौराणिक कथा के अनुसार, माता पार्वती बचपन से ही भगवान शिव को अपने पति के रूप में प्राप्त करना चाहती थीं। इसके लिए उन्होंने बाल्यकाल में ही दृढ़ संकल्प ले लिया था। जब माता पार्वती विवाह योग्य हुईं, तो उनके पिता पर्वतराज हिमालय उनके लिए योग्य और श्रेष्ठ वर की तलाश करने लगे।
इसी दौरान एक दिन देवर्षि नारद मुनि पर्वतराज हिमालय के महल में पधारे। नारद जी ने पर्वतराज को सुझाव दिया कि श्री हरि विष्णु माता पार्वती के लिए सबसे सर्वगुण संपन्न और योग्य वर हैं, इसलिए उन्हें अपनी पुत्री का विवाह भगवान विष्णु से कर देना चाहिए। पर्वतराज हिमालय को यह प्रस्ताव अत्यंत प्रिय लगा और वे तुरंत विवाह के लिए सहर्ष तैयार हो गए।
माता पार्वती की कठिन तपस्या
जब माता पार्वती को यह ज्ञात हुआ कि उनके पिता उनका विवाह भगवान विष्णु से तय करने का विचार कर रहे हैं, तो वे अत्यधिक व्यथित और चिंतित हो गईं। क्योंकि वे अपने मन में भगवान शिव को ही अपना पति मान चुकी थीं। अपने संकल्प को पूरा करने के लिए माता पार्वती अपने गृह का त्याग करके एकांत और घने जंगल में चली गईं।
जंगल में पहुंचकर उन्होंने भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए अन्न-जल का त्याग कर अत्यंत कठोर तपस्या आरंभ कर दी। मान्यताओं के अनुसार, माता पार्वती ने कड़ाके की ठंड, भीषण गर्मी और मूसलाधार बारिश की परवाह किए बिना पूरे 108 वर्षों तक कठिन तपस्या की। उन्हें अपनी भक्ति और साधना पर पूरा विश्वास था कि भगवान शिव उनकी मनोकामना अवश्य पूर्ण करेंगे।
शिव-पार्वती का दिव्य मिलन और व्रत का आरंभ
माता पार्वती के 108 वर्षों के घोर और कठोर तप से प्रसन्न होकर अंततः भगवान शिव प्रकट हुए और उन्होंने माता पार्वती को अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार करने का वरदान दिया। धार्मिक कथाओं के अनुसार, भगवान शिव और माता पार्वती का यह अलौकिक तथा दिव्य मिलन श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को ही हुआ था।
उसी ऐतिहासिक और पावन दिन की स्मृति में हर वर्ष श्रावण तृतीया को ‘हरियाली तीज’ के रूप में मनाया जाने लगा। इस दिन महिलाएं अखंड सौभाग्य और पति की दीर्घायु की कामना के साथ यह व्रत रखती हैं।
(विशेष नोट: कुछ क्षेत्रीय परंपराओं और पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान शिव और माता पार्वती का मिलन भाद्रपद (भादों) मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को हुआ माना जाता है, जिसे ‘हरतालिका तीज’ के नाम से जाना जाता है और कई क्षेत्रों में महिलाएं उस दिन व्रत का पालन करती हैं।)
















































