भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अमावस्या तिथि धार्मिक एवं आध्यात्मिक दृष्टिकोण से अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है। इसे पिठोरी अमावस्या, कुशाग्रहणी अमावस्या, पोला अमावस्या और मातृ अमावस्या के नाम से जाना जाता है। 9 सितंबर 2026 को त्रयोदशी और चतुर्दशी तिथि व्याप्त रहेगी, जबकि अमावस्या तिथि का प्रारंभ 10 सितंबर 2026 की सुबह से होगा।
यहाँ कुशा (पवित्र घास) संग्रहण से जुड़ी समस्त जानकारियों और पिठोरी अमावस्या व्रत विधान, कथा व पूजन विधि का एक विस्तृत और एकीकृत विवरण प्रस्तुत है:
पिठोरी अमावस्या से जुड़ी संपूर्ण जानकारी
पिठोरी अमावस्या का व्रत माताएं अपनी संतान की लंबी आयु, आरोग्य, वंश वृद्धि और कुल की सुख-समृद्धि के लिए रखती हैं। इस व्रत में आटे (पीठ) से 64 योगिनियों, सप्त मातृकाओं और देवी पिठोरी की प्रतिमाएं बनाकर पूजा की जाती है।
तिथि, शुभ मुहूर्त एवं राहुकाल (लखनऊ व मानक समय)
- अमावस्या तिथि प्रारंभ: 10 सितंबर 2026 (गुरुवार) – सुबह 10:33 बजे से
- अमावस्या तिथि समाप्त: 11 सितंबर 2026 (शुक्रवार) – सुबह 08:56 बजे तक
- पिठोरी व्रत व शाम की पूजा का मुहूर्त (10 सितंबर): शाम 06:33 बजे से रात्रि 08:51 बजे तक (प्रदोष काल)
- अमावस्या स्नान, दान एवं पितृ तर्पण (11 सितंबर): उदयातिथि के अनुसार 11 सितंबर को प्रातःकाल।
लखनऊ (उत्तर प्रदेश) हेतु सूर्योदय एवं राहुकाल सारणी:
| दिनांक व दिन | सूर्योदय | राहुकाल (अशुभ समय) | धार्मिक कार्य |
| 10 सितंबर 2026 (गुरुवार) | सुबह 05:49 बजे | दोपहर 01:30 से 03:00 बजे तक | पिठोरी अमावस्या व्रत व प्रदोषकालीन पूजा |
| 11 सितंबर 2026 (शुक्रवार) | सुबह 05:50 बजे | सुबह 10:30 से दोपहर 12:00 बजे तक | अमावस्या स्नान, दान एवं कुशा संग्रहण |
पिठोरी व्रत की संपूर्ण पूजा सामग्री सूची
- मुख्य आधार: गेहूं या चावल का शुद्ध आटा (64 देवियों की पिंडी/मूर्तियां बनाने के लिए)।
- स्थापना व बर्तन: साफ लकड़ी की चौकी, लाल या पीला सूती कपड़ा, तांबे या मिट्टी का कलश, नारियल, आम/अशोक के पत्ते।
- अभिषेक व तिलक: गंगाजल, हल्दी, कुमकुम, सिंदूर, अबीर, रोली, मौली (कलावा), अक्षत (बिना टूटे चावल)।
- सुवास व दीपक: गाय का शुद्ध घी, तिल का तेल, दीपक, कपूर, धूपबत्ती, अगरबत्ती।
- अर्पण सामग्री: ताजे लाल फूल, दूर्वा, तुलसी दल, सुपारी (9 या 64), दक्षिणा के लिए सिक्के।
- सुहाग सामग्री: माता दुर्गा हेतु चूड़ियां, बिंदी, सिंदूर, मेहंदी और चुनरी।
- विशेष नैवेद्य (भोग): रोटी, चूरमा, गुड़, पूड़ी, खीर, हलवा, पूरनपोली या 11/21 प्रकार के आटे से बने पकवान।
पिठोरी व्रत एवं 64 योगिनी पूजन विधि
- संकल्प: 10 सितंबर की सुबह स्नान के पश्चात संकल्प लें:“मम इह जन्मनि जन्मान्तरे व सौभाग्यपुत्र पौत्रफलावाप्त्यर्थं पिठोरीव्रतं करिष्ये”
- प्रतिमा निर्माण: शाम को उत्तर-पूर्व (ईशान कोण) में चौकी पर लाल कपड़ा बिछाएं। शुद्ध आटे में हल्दी और जल मिलाकर 64 छोटी-छोटी पिंडियां (सुपारी के आकार की) बनाएं, जो 64 योगिनियों का प्रतीक हैं।
- मातृका पूजन: सप्त मातृकाओं (ब्राह्मी, वैष्णवी, वाराही, माहेश्वरी, कौमारी, इन्द्राणी, चामुण्डा) एवं भगवान शिव-पार्वती की आकृति स्थापित करें।
- पंचोपचार पूजन: सभी पिंडियों और प्रतिमाओं पर जल छिड़कें। रोली, कुमकुम, हल्दी, अक्षत, पुष्प और सुहाग सामग्री अर्पित करें।
- भोग अर्पण: सात्विक पकवानों (रोटी, चूरमा, खीर, पूड़ी, घी) का भोग लगाएं।
- कथा व आरती: पिठोरी व्रत कथा सुनें तथा 64 योगिनियों व मां दुर्गा की आरती करें।
- आशीर्वाद: पूजा के अंत में देवियों के चरणों से सिंदूर लेकर अपनी संतान के माथे पर लगाएं।
पिठोरी व्रत की प्रामाणिक कथा
पौराणिक कथानुसार, यह कथा सर्वप्रथम माता पार्वती ने देवराज इंद्र की पत्नी इंद्राणी (शची) को सुनाई थी:
एक नगर में एक सुखी साहूकार का परिवार रहता था। उसके सात बेटे और सातों बहुएं थीं। भाद्रपद अमावस्या आने पर सातों बहुओं ने अपनी संतान की रक्षा के लिए पिठोरी व्रत का संकल्प लिया। परंतु दुर्भाग्यवश, सबसे बड़ी बहू का बेटा व्रत पूरा होते ही शांत (मृत) हो जाता था। लगातार कई वर्षों तक यही दुखद घटना घटित हुई।
कुलक्षणी कहलाने के डर और दुख के कारण इस बार बड़ी बहू ने अपने मृत बच्चे के शव को एक गुप्त स्थान पर छुपा दिया। उस रात 64 योगिनियां और माता दुर्गा (पोलेरा माता) नगर की रक्षा हेतु भ्रमण कर रही थीं। उन्होंने उस दुखी मां को रोते हुए देखा और दयापूर्वक उसके विलाप का कारण पूछा। बहू ने रोते हुए अपनी पूरी व्यथा कह सुनाई।
उसकी सच्ची भक्ति से प्रसन्न होकर देवियों ने निर्देश दिया कि वह उस गुप्त स्थान पर जाकर हल्दी और अक्षत छिड़क दे जहाँ उसके बच्चों के शव रखे हैं। मां ने पूर्ण श्रद्धा के साथ वैसा ही किया। माता रानी की असीम कृपा से उसके सातों पुत्र पुनर्जीवित हो उठे। तभी से संतान की सुरक्षा, आरोग्य और दीर्घायु के लिए पिठोरी अमावस्या का व्रत रखा जाता है।
अमावस्या के दिन ध्यान रखने योग्य नियम (क्या करें और क्या न करें)
- क्या करें: पवित्र नदी में स्नान करें, सूर्य देव को अर्घ्य दें, पितरों के नाम से तर्पण करें और दान (अन्न, वस्त्र, काले तिल) दें। शाम को पीपल के वृक्ष के नीचे सरसों के तेल का दीपक जलाएं।
- क्या न करें: घर में कलह या वाद-विवाद न करें। मांस, मदिरा, लहसुन व प्याज जैसे तामसिक भोजन से पूर्णतः दूर रहें और ब्रह्मचर्य का पालन करें।
कुशा (कुश) से जुड़ी संपूर्ण जानकारी एवं नियम
वैदिक सनातन धर्म में किसी भी प्रकार की पूजा, अनुधान, हवन, यज्ञ, तर्पण या श्राद्ध कर्म में ‘कुश’ (एक प्रकार की विशेष पवित्र घास) का उपयोग अनिवार्य माना गया है। बिना कुश के की गई पूजा या तर्पण पूर्ण फलदायी नहीं होता।
कुशाग्रहणी (कुशोत्पाटिनी) अमावस्या का महत्व
भाद्रपद अमावस्या के दिन वर्षभर में आयोजित होने वाले धार्मिक अनुष्ठानों और पितृ कर्मों के लिए मंत्रोच्चारपूर्वक कुश उखाड़कर घर लाने की परंपरा है। इस विशेष तिथि पर शास्त्रोक्त विधि से एकत्र की गई कुश पूरे एक वर्ष तक पवित्र मानी जाती है और सभी धार्मिक कार्यों में उपयोग की जा सकती है।
कुशा उखाड़ने का शुभ समय (11 सितंबर 2026, सुबह)
- तारीख: 11 सितंबर 2026 (शुक्रवार)
- समय: उदयातिथि के अनुसार सूर्योदय के समय (सुबह 05:50 बजे के पश्चात)।
- विशेष: 11 सितंबर को सुबह 10:30 बजे से दोपहर 12:00 बजे तक राहुकाल रहेगा, इसलिए राहुकाल से पूर्व प्रातः काल में ही कुशा का संग्रहण कर लेना चाहिए।
कुशा उखाड़ने की प्रामाणिक विधि एवं नियम
- दिशा व शुद्धि: स्नान करने के पश्चात शुद्ध वस्त्र धारण करें और पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें।
- जल प्रोक्षण: दाहिने हाथ में जल लेकर कुश पर छिड़कें।
- बिना औजार का प्रयोग: कुश को किसी लोहे के औजार, खुरपी या चाकू से नहीं काटना चाहिए। इसे केवल हाथ से ही उखाड़ा जाता है।
- अक्षत व अखंडित: ध्यान रहे कि उखाड़ते समय कुश की पत्तियां कटे-फटे नहीं और उसकी जड़ें सुरक्षित रहें।
कुशा संग्रहण का पवित्र मंत्र
कुश को स्पर्श करते हुए निम्नलिखित मंत्र का स्पष्ट उच्चारण करें:
“विघ्नराज नमस्तुभ्यं देवराज जगत्पते।
मम कर्म फलार्थाय कुशां गृह्णामि पावनम्॥”
(अथवा संक्षिप्त मंत्र: “ॐ हुं फट् स्वाहा।”)
नियम: मंत्र बोलते हुए दाहिने हाथ के अंगूठे और उंगलियों से कुश के मूल (जड़) को पकड़ें और एक झटके में उखाड़ लें।













































