कॉमनवेल्थ गेम्स में भारत की महिला जूडो खिलाड़ी अस्मिता डे ने एक बहुत बड़ी और ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल की है। उन्होंने अड़तालीस किलोग्राम भार वर्ग में अपना शानदार खेल दिखाते हुए देश के लिए स्वर्ण पदक जीत लिया है। इस प्रतियोगिता के इतिहास में यह पहला मौका है जब किसी भारतीय जूडो खिलाड़ी ने गोल्ड मेडल अपने नाम किया है। फाइनल मुकाबले में उन्होंने कनाडा की खिलाड़ी हेइडी क्वैच को करारी शिकस्त देकर यह शानदार सफलता प्राप्त की है। इस ऐतिहासिक जीत के साथ ही उन्होंने पूरे देश का नाम अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बहुत गर्व के साथ ऊंचा कर दिया है।
फाइनल और सेमीफाइनल का रोमांच स्वर्ण पदक के लिए हुए फाइनल मुकाबले में अस्मिता डे का सामना कनाडा की मजबूत प्रतिद्वंद्वी हेइडी क्वैच से हुआ था। इस बेहद रोमांचक फाइनल मैच में उन्होंने ‘गोल्डन स्कोर’ यानी सडन डेथ के जरिए अपनी विरोधी को हरा दिया। इससे पहले सेमीफाइनल मैच में भी इस प्रतिभाशाली खिलाड़ी ने अपने शानदार खेल कौशल का अद्भुत प्रदर्शन किया था। सेमीफाइनल मुकाबले में उन्होंने स्कॉटलैंड की समर शॉ को युको के आधार पर एक-शून्य से पूरी तरह मात दी थी। इसी शानदार जीत के साथ उन्होंने फाइनल में प्रवेश किया था और देश के लिए अपना एक पदक पूरी तरह पक्का कर लिया था।
क्वार्टर फाइनल की जीत और हर्ष का शानदार सफर सेमीफाइनल से पहले क्वार्टर फाइनल मैच में भी अस्मिता डे ने अपने बेहतरीन प्रदर्शन से सभी दर्शकों का दिल जीत लिया था। क्वार्टर फाइनल में उन्होंने स्कॉटलैंड की ईवा इविंग को इप्पोन के जरिए हराकर प्रतियोगिता के अगले दौर में जगह बनाई थी। जूडो के खेल में अस्मिता के अलावा भारत के एक और प्रतिभाशाली खिलाड़ी हर्ष सिंह ने भी पदक की उम्मीद जगाई है। हर्ष सिंह ने पुरुषों के साठ किलोग्राम भार वर्ग के सेमीफाइनल में ऑस्ट्रेलिया के पेड्रो कार्लोस एंटुन नेटो को हराकर फाइनल में प्रवेश कर लिया है। अब हर्ष सिंह की नजरें भी जूडो के फाइनल मुकाबले में अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करते हुए देश के लिए स्वर्ण पदक जीतने पर टिकी हुई हैं।
एथलेटिक्स से जूडो तक का सफर देश को ऐतिहासिक स्वर्ण पदक दिलाने वाली प्रतिभाशाली अस्मिता डे मूल रूप से त्रिपुरा राज्य के बेलोनिया शहर की रहने वाली हैं। जूडो के खेल की दुनिया में अपना कदम रखने से पहले वह मुख्य रूप से एक ट्रैक और फील्ड एथलीट हुआ करती थीं। अपने शुरुआती खेल करियर के दौरान वह एथलेटिक्स में आठ सौ मीटर की दौड़ की प्रतियोगिताओं में पूरे जोश के साथ हिस्सा लिया करती थीं। एक बार जिला स्तरीय ट्रायल के दौरान अचानक उनका रुझान जूडो के खेल की तरफ काफी ज्यादा बढ़ने लगा था। इसके बाद उन्होंने अपने एथलेटिक्स के करियर को छोड़कर जूडो को ही अपने मुख्य खेल के रूप में हमेशा के लिए अपना लिया।
बेहतरीन प्रशिक्षण और सरकारी सहयोग जूडो को अपनाने के बाद अस्मिता डे ने अपनी खेल तकनीक को सुधारने के लिए कड़ी मेहनत और कड़ा अभ्यास शुरू कर दिया। उन्होंने भोपाल में स्थित भारतीय खेल प्राधिकरण यानी साई रीजनल सेंटर में अपनी विशेष ट्रेनिंग को सफलतापूर्वक पूरा किया है। इस ट्रेनिंग सेंटर में उन्होंने अपने अनुभवी कोच यशपाल सोलंकी की देखरेख में जूडो की कई महत्वपूर्ण और जरूरी बारीकियां सीखीं। उनके शानदार खेल और प्रतिभा को देखते हुए उन्हें सरकार की तरफ से भी पूरा खेल सहयोग प्रदान किया जा रहा है। वर्तमान समय में वह भारत सरकार की ‘टारगेट ओलंपिक पोडियम स्कीम’ यानी टॉप्स डेवलपमेंट ग्रुप का एक बहुत अहम हिस्सा बनी हुई हैं।
पदक तालिका में भारत की मजबूत स्थिति वर्तमान कॉमनवेल्थ गेम्स में भारतीय दल का अब तक का समग्र प्रदर्शन काफी ज्यादा अच्छा और बेहद सराहनीय रहा है। भारतीय खिलाड़ियों ने अलग-अलग खेलों में अपनी शानदार प्रतिभा दिखाते हुए अब तक कुल अठारह पदक अपने नाम कर लिए हैं। इन जीते गए पदकों में चार स्वर्ण पदक, दस रजत पदक और चार कांस्य पदक भारत की झोली में पूरी शान से आ चुके हैं। अपने इस बेहतरीन और लगातार सुधरते प्रदर्शन के आधार पर भारत अब पदक तालिका में नौवें स्थान पर पहुंच गया है। प्रतियोगिता के नौवें दिन जूडो की इस ऐतिहासिक सफलता से पहले भारतीय मुक्केबाजों ने भी आज के दिन काफी जबरदस्त प्रदर्शन किया है।


























































