आजकल की भागदौड़ भरी जिंदगी, बिगड़ी हुई लाइफस्टाइल और असंतुलित खान-पान के कारण पेट तथा आंतों से जुड़ी समस्याएं बहुत आम हो गई हैं। हम अक्सर कब्ज, गैस, एसिडिटी या अपच जैसी तकलीफों को साधारण समझकर नजरअंदाज कर देते हैं या बिना डॉक्टरी सलाह के ओवर-द-काउंटर दवाइयां खाकर दबाने की कोशिश करते हैं।
हालांकि, स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि पेट और आंतों से जुड़ी लंबे समय की समस्याएं आगे चलकर कोलोरेक्टल कैंसर (कोलोन यानी बड़ी आंत और मलाशय का कैंसर) का रूप ले सकती हैं। डॉ. विनीत गोयल (कंसल्टेंट, सर्जिकल ऑन्कोलॉजी, फोर्टिस एस्कॉर्ट्स हार्ट इंस्टीट्यूट, ओखला) के अनुसार, कोलोरेक्टल कैंसर के शुरुआती संकेतों को पहचानना और सही समय पर स्क्रीनिंग टेस्ट करवाना जीवन की रक्षा के लिए बेहद जरूरी है।
वैश्विक आंकड़े और गंभीरता (IARC GLOBOCAN रिपोर्ट)
इंटरनेशनल एजेंसी फॉर रिसर्च ऑन कैंसर (IARC) के GLOBOCAN अनुमानों के अनुसार:
- तीसरा सबसे आम कैंसर: कोलोरेक्टल कैंसर पूरी दुनिया में तीसरा सबसे ज्यादा होने वाला कैंसर है।
- मौत का दूसरा बड़ा कारण: कैंसर से होने वाली मौतों के मामलों में यह विश्व स्तर पर दूसरे स्थान पर आता है।
- मामले और मृत्यु दर: हर साल दुनिया भर में इसके लगभग 19.3 लाख नए मामले सामने आते हैं और लगभग 9.04 लाख लोग इससे अपनी जान गंवाते हैं।
कोलोरेक्टल कैंसर के प्रमुख लक्षण
कोलोरेक्टल कैंसर के लक्षण अक्सर सामान्य पाचन संबंधी बीमारियों जैसे लगते हैं, लेकिन इन्हें हल्के में नहीं लेना चाहिए:
- पेट व मल संबंधी बदलाव: बिना दर्द वाली गांठ महसूस होना, पेट में मरोड़ या ऐंठन जैसा दर्द, मल में खून आना और आंतों में रुकावट होना।
- शारीरिक लक्षण: लगातार बिना वजह बहुत ज्यादा थकान होना, शरीर में खून की कमी (एनीमिया) होना और भूख में अचानक कमी आना।
- एडवांस लक्षण: बीमारी बढ़ने पर पीलिया (Jaundice) होना या हड्डियों में तेज दर्द रहना।
महत्वपूर्ण बात: ये लक्षण छोटी आंत के ट्यूमर या पेट के अन्य कैंसर से भी मिलते-जुलते हो सकते हैं। इन लक्षणों का होना सीधे तौर पर कैंसर की पुष्टि नहीं करता, लेकिन यदि ये 2 से 3 सप्ताह तक लगातार बने रहें, तो तुरंत विशेषज्ञ डॉक्टर से जांच करानी चाहिए।
कैंसर का पता लगाने की प्रमुख जांचें (Diagnosis)
यदि लक्षण बने रहते हैं, तो निम्नलिखित चिकित्सकीय जांचों के माध्यम से बीमारी का सटीक पता लगाया जाता है:
- बायोप्सी (Biopsy): कैंसर की पुष्टि के लिए सबसे विश्वसनीय और प्रामाणिक जांच बायोप्सी ही है। इसमें प्रभावित गांठ या टिशू (ऊतक) का छोटा सा सैंपल लेकर लैब में जांच की जाती है।
- कोलोनोस्कोपी (Colonoscopy): इसमें एक पतली, लचीली ट्यूब के जरिए बड़ी आंत और मलाशय की अंदरूनी परत को देखा जाता है।
- मल में छिपे हुए खून की जांच (FOBT): मल में सूक्ष्म रक्त की उपस्थिति की पहचान के लिए।
- रूटीन ब्लड टेस्ट: हीमोग्लोबिन स्तर और इंफेक्शन की स्थिति जानने के लिए।
बायोप्सी से जुड़ी सबसे बड़ी भ्रांति (Myth vs Fact)
- भ्रांति: समाज में यह आम गलतफहमी है कि बायोप्सी कराने से कैंसर पूरे शरीर में तेजी से फैल जाता है।
- सच्चाई: यह धारणा पूरी तरह वैज्ञानिक आधारहीन और गलत है। बायोप्सी से कैंसर नहीं फैलता। इस भ्रम के कारण कई मरीज जांच कराने से डरते हैं और डायग्नोसिस में देरी हो जाती है। परिणाम स्वरूप बीमारी एडवांस स्टेज (अंतिम चरण) में पहुंच जाती है, जिससे इलाज कठिन हो जाता है।
स्क्रीनिंग कब और किसे करानी चाहिए?
समय पर स्क्रीनिंग कराने से कैंसर को शुरुआती स्टेज में ही पकड़ा जा सकता है, जिससे इसका पूर्ण इलाज संभव हो पाता है:
- सामान्य व्यक्तियों के लिए: अंतरराष्ट्रीय दिशानिर्देशों (International Guidelines) के अनुसार, 45 से 50 वर्ष की उम्र के बाद हर स्वस्थ व्यक्ति को स्क्रीनिंग कोलोनोस्कोपी जरूर करानी चाहिए। यदि रिपोर्ट नॉर्मल आती है, तो इसे हर 10 साल में एक बार दोहराना चाहिए।
- जेनेटिक या फैमिली हिस्ट्री: कोलोरेक्टल कैंसर अनुवंशिक (Genetic) भी हो सकता है और पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ सकता है। जिन परिवारों में पहले किसी को यह कैंसर रहा हो, उन्हें 45 वर्ष से कम उम्र में ही डॉक्टर की सलाह से नियमित कोलोनोस्कोपी शुरू कर देनी चाहिए, ताकि बिना किसी लक्षण के भी शुरुआती स्टेज में इसका पता लगाया जा सके।











































