वैदिक पंचांग के अनुसार, 9 सितंबर 2026, बुधवार को भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि है। इस दिन मासिक शिवरात्रि का अत्यंत पवित्र व्रत रखा जाएगा। सनातन धर्म में शिवरात्रि का विशेष महत्व है, क्योंकि यह दिन भगवान शिव और माता पार्वती की कृपा प्राप्त करने के लिए सर्वोत्तम माना गया है। विशेष रूप से यह शिवरात्रि पितृ पक्ष (श्राद्ध) शुरू होने से पूर्व की अंतिम शिवरात्रि है, जिससे इसका धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व और भी बढ़ जाता है।
यहाँ 9 सितंबर 2026 की मासिक शिवरात्रि की तिथि, शुभ मुहूर्त, चार प्रहर की पूजा विधि, सामग्री, पौराणिक कथा, वर्जित कार्य, विशेष उपाय और पारण के नियमों की संपूर्ण जानकारी दी गई है।
तिथि और शुभ मुहूर्त समय तालिका
शिवरात्रि की मुख्य पूजा मध्यरात्रि यानी ‘निशिता काल’ में की जाती है। चतुर्दशी तिथि का रात्रिकालीन संयोग 9 सितंबर को होने के कारण इसी दिन व्रत का पालन किया जाएगा।
| विवरण | तिथि एवं समय |
| चतुर्दशी तिथि प्रारंभ | 9 सितंबर 2026 को दोपहर 12:31 बजे से |
| चतुर्दशी तिथि समाप्त | 10 सितंबर 2026 को सुबह 10:33 बजे तक |
| मुख्य पूजा (निशिता काल मुहूर्त) | 9 सितंबर की मध्यरात्रि (रात 11:53 बजे से 12:40 बजे तक) |
| व्रत पारण का समय | 10 सितंबर 2026 को सुबह 06:05 बजे से 10:33 बजे के बीच |
रात्रि के चारों प्रहरों का सटीक समय एवं अभिषेक सामग्री
शिवरात्रि की रात्रि को चार भागों (प्रहरों) में विभाजित करके पूजा करने का विधान है। यदि आप पूरी रात जागरण करके साधना करना चाहते हैं, तो चारों प्रहर का समय और उनकी विशिष्ट अभिषेक सामग्री निम्नलिखित है:
- प्रथम प्रहर पूजा (शाम): शाम 06:15 बजे से रात 09:20 बजे तक
- अभिषेक सामग्री: शुद्ध गाय का कच्चा दूध।
- द्वितीय प्रहर पूजा (रात्रि): रात 09:20 बजे से मध्यरात्रि 12:25 बजे तक
- अभिषेक सामग्री: ताज़ा दही।
- तृतीय प्रहर पूजा (मध्यरात्रि/निशिता काल): रात 12:25 बजे से तड़के 03:30 बजे तक
- अभिषेक सामग्री: गाय का शुद्ध देसी घी। (विशेष निशिता काल मुहूर्त रात 11:53 से 12:40 के मध्य रहेगा)
- चतुर्थ प्रहर पूजा (भोर/ब्रह्म मुहूर्त): तड़के 03:30 बजे से सुबह 06:35 बजे (सूर्योदय) तक
- अभिषेक सामग्री: शुद्ध शहद (मधु)।
शिवलिंग अभिषेक का सही क्रम (Step-by-Step Abhishekam)
शास्त्रों के अनुसार, शिवलिंग पर पंचामृत और जल अर्पित करने का एक निश्चित क्रम निर्धारित है। प्रत्येक सामग्री चढ़ाते समय निरंतर “ॐ नमः शिवाय” मंत्र का जाप करें:
- शुद्ध जल: सबसे पहले तांबे के पात्र से जल चढ़ाकर शिवलिंग को स्नान कराएं।
- गंगाजल: इसके पश्चात पवित्र गंगाजल अर्पित करें।
- दूध: कच्चा और शुद्ध गाय का दूध चढ़ाएं।
- दही: दूध के बाद दही से स्नान कराएं।
- घी: गाय का शुद्ध देसी घी अर्पित करें।
- शहद: घी के बाद शहद चढ़ाएं।
- शक्कर (बूरा): पंचामृत की अंतिम सामग्री के रूप में शक्कर अर्पित करें।
- शुद्धोदक स्नान: अंत में पुनः शुद्ध जल या गंगाजल से शिवलिंग को स्वच्छ करें।
विशेष श्रृंगार सामग्रियां:
स्नान के पश्चात शिवलिंग पर चंदन का लेप लगाएं। इसके बाद भस्म (विभूति), अक्षत (अखंडित चावल), बेलपत्र (उल्टा करके), धतूरा, मदार (आक) के फूल और आभूषण अर्पित करें। अंत में धूप-दीप जलाकर आरती करें।
मासिक शिवरात्रि की पौराणिक व्रत कथा
शिव पुराण के अनुसार, शिवरात्रि व्रत से जुड़ी कई कथाएं प्रचलित हैं, जिनमें से निषाद (चित्रभानू शिकारी) की कथा अत्यंत प्रसिद्ध है:
प्राचीन काल में एक निषाद (शिकारी) जंगल में जीवों का शिकार करके अपने परिवार का पालन-पोषण करता था। वह एक साहूकार का कर्जदार था। समय पर ऋण न चुका पाने के कारण साहूकार ने उसे शिवरात्रि के दिन एक शिवमन्दिर में बंदी बना लिया। मंदिर में बैठकर शिकारी दिनभर अनजाने में ही भगवान शिव के भजन और कथाएं सुनता रहा।
शाम को साहूकार ने उसे अगले दिन कर्ज चुकाने का वचन लेकर मुक्त कर दिया। शिकारी शिकार की तलाश में जंगल की ओर चला गया और रात हो जाने पर एक बेलपत्र के पेड़ पर चढ़कर बैठ गया। उस पेड़ के नीचे एक शिवलिंग स्थापित था, जो पत्तों से ढका होने के कारण शिकारी को दिखाई नहीं दे रहा था।
- प्रथम प्रहर: रात के प्रथम प्रहर में एक गर्भिणी हिरणी वहां आई। शिकारी ने जैसे ही धनुष पर तीर साधा, पेड़ के हिलने से कुछ बेलपत्र और जल की बूंदें नीचे शिवलिंग पर गिर गईं। अनजाने में उसके प्रथम प्रहर की पूजा संपन्न हो गई। हिरणी के निवेदन पर कि वह बच्चे को जन्म देकर वापस आएगी, शिकारी ने उसे छोड़ दिया।
- द्वितीय व तृतीय प्रहर: दूसरे और तीसरे प्रहर में भी अन्य हिरणियां वहां आईं। हर बार धनुष उठाने पर बेलपत्र टूटकर शिवलिंग पर गिरते रहे। इस प्रकार भूखे-प्यासे रहकर अनजाने में ही उसके तीन प्रहर की पूजा पूरी हो गई, जिससे उसका हृदय निर्मल होता गया।
- चतुर्थ प्रहर: सुबह के समय जब एक मृग (हिरण) आया, तो शिकारी ने पुनः धनुष उठाया और फिर से बेलपत्र शिवलिंग पर गिरे। परंतु रातभर भगवान शिव के सानिध्य में रहने और अनजाने में व्रत-पूजा संपन्न होने से शिकारी का हृदय पूरी तरह परिवर्तित हो चुका था। उसने जीव हिंसा न करने का संकल्प लिया और मृग को सहर्ष जाने दिया।
शिकारी के इस अनजाने में किए गए निश्छल उपवास, जागरण और चारों प्रहर के पूजन से भगवान शिव अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने साक्षात दर्शन देकर शिकारी को सुख-समृद्धि और अंत में मोक्ष प्रदान किया।
कथा का संदेश: यह कथा स्पष्ट करती है कि यदि अनजाने में भी पूरी निष्ठा से शिवरात्रि का व्रत हो जाए, तो महादेव प्रसन्न हो जाते हैं। जब इसे पूर्ण श्रद्धा के साथ किया जाए, तो इसका फल अनन्य होता है।
पूजा में क्या करें और क्या न करें?
वर्जित कार्य एवं सामग्रियां (क्या न करें):
- तुलसी दल न चढ़ाएं: भगवान शिव की पूजा में तुलसी चढ़ाना वर्जित है, क्योंकि शिव जी ने तुलसी के पति असुर जालंधर का वध किया था।
- केतकी का फूल निषेध: ब्रह्मा जी के असत्य में भागीदार बनने के कारण शिव जी ने केतकी के फूल को अपनी पूजा से त्याग दिया था।
- शंख से जल न दें: शिव जी ने शंखचूड़ नाम के असुर का वध किया था, इसलिए शंख से जल अर्पित करना या शंख बजाना मना है।
- सिंदूर, हल्दी और कुमकुम: शिवलिंग वैराग्य का प्रतीक है, अतः इस पर हल्दी, सिंदूर या कुमकुम न लगाएं (केवल चंदन व भस्म लगाएं)।
- कटे-फटे बेलपत्र: कीड़ों के खाए हुए या कटे-फटे बेलपत्र न चढ़ाएं। बेलपत्र सदैव तीन पत्तियों वाला और स्वच्छ होना चाहिए।
- दिन में न सोएं: व्रत वाले दिन दोपहर में सोने से बचें और समय को शिव नाम के मानसिक जाप में बिताएं।
सकारात्मक एवं आवश्यक कार्य (क्या करें):
- मन-कर्म-वचन की शुद्धता: मन में किसी के प्रति द्वेष, ईर्ष्या या असत्य विचार न लाएं। ब्रह्मचर्य का पालन करें।
- दान-पुण्य: जरूरतमंदों को अन्न, वस्त्र या काले तिल का दान करना अत्यंत शुभ माना जाता है।
- क्षमा याचना: पूजा के अंत में भगवान शिव से अपनी अनजानी भूलों के लिए क्षमा प्रार्थना अवश्य करें।
- दीप दान: शाम के समय घर के मुख्य द्वार या निकटतम शिव मंदिर में दीपक जलाएं।
मासिक शिवरात्रि के विशेष उपाय
- धन लाभ और कर्ज मुक्ति के लिए: शिवलिंग पर बिना टूटे हुए अक्षत (चावल) चढ़ाएं और जल में काले तिल मिलाकर अभिषेक करें।
- विवाह में बाधा व दांपत्य सुख के लिए: शिवलिंग पर केसर युक्त दूध चढ़ाएं और माता पार्वती को सुहाग की सामग्री (चूड़ी, बिंदी, सिंदूर) अर्पित करें।
- नौकरी व व्यापार में उन्नति के लिए: शिवलिंग पर शहद और गाय का शुद्ध घी अर्पित करने के बाद शुद्ध जल से स्नान कराएं।
- मानसिक शांति व स्वास्थ्य लाभ के लिए: शिवलिंग पर मिश्री मिला हुआ शीतल दूध अर्पित करें और महामृत्युंजय मंत्र का जाप करें।
प्रभावशाली शिव मंत्र
पूजा व अभिषेक के समय निम्नलिखित मंत्रों का रुद्राक्ष की माला से उत्तर या पूर्व दिशा की ओर मुख करके 108 बार जाप करें:
- मूल मंत्र (मानसिक शांति हेतु):
ॐ नमः शिवाय॥ - महामृत्युंजय मंत्र (आरोग्य व अकाल मृत्यु से रक्षा हेतु):
ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्। उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥ - शिव गायत्री मंत्र (समृद्धि व भाग्योदय हेतु):
ॐ तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि तन्नो रुद्रः प्रचोदयात्॥ - शिव-पार्वती मंत्र (शीघ्र विवाह व वैवाहिक सुख हेतु):
हे गौरी शंकरार्धांगी। यथा त्वं शंकरप्रिया। तथा मां कुरु कल्याणी, कान्त कान्तां सुदुर्लभाम्॥ - रुद्र मंत्र (संकट मुक्ति हेतु):
ॐ नमो भगवते रुद्राय॥
व्रत पारण के नियम: क्या खाएं और क्या न खाएं?
10 सितंबर 2026 को सुबह सूर्योदय के पश्चात (और चतुर्दशी तिथि समाप्त होने यानी सुबह 10:33 बजे से पूर्व) व्रत का पारण करना सबसे उत्तम माना जाता है।
- पारण में क्या खाएं:
- पूजा में चढ़ाया गया चरणामृत या गंगाजल ग्रहण करके व्रत खोलें।
- सात्विक एवं हल्का भोजन जैसे लौकी, तरोई, आलू या कद्दू की सब्जी खाएं।
- कुट्टू/सिंघाड़े के आटे की पूरी या मूंग दाल की सुपाच्य खिचड़ी का सेवन करें।
- फल (केला, सेब, अनार) और भीगे हुए मेवे खाएं।
- पारण के दिन क्या न खाएं:
- भोजन में लहसुन और प्याज का प्रयोग पूरी तरह वर्जित है।
- बहुत अधिक तला-भुना, अत्यधिक मसालेदार या बासी भोजन न खाएं।
- किसी भी प्रकार के तामसिक पदार्थों से दूर रहें।













































