आषाढ़ माह की पूर्णिमा तिथि को रखा जाने वाला ‘कोकिला व्रत’ माता सती और भगवान शिव को समर्पित है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, पिता द्वारा भगवान शिव के अपमान से आहत होकर माता सती ने आत्मदाह कर लिया था। इसके बाद उन्होंने 1000 दिव्य वर्षों तक कोयल (कोकिला) के रूप में समय व्यतीत किया और फिर पुनः अपना स्वरूप प्राप्त कर शिव जी में समाहित हो गईं। इसी मान्यता के चलते स्त्रियां सौभाग्य प्राप्ति के लिए यह व्रत रखती हैं।
इस वर्ष कोकिला व्रत 28 जुलाई 2026 को रखा जा रहा है।
पूजा का शुभ मुहूर्त
कोकिला व्रत में समय का विशेष महत्व होता है। आज के दिन के प्रमुख मुहूर्त इस प्रकार हैं:
- ब्रह्म मुहूर्त: प्रातः 05:03 बजे से 05:47 बजे तक
- प्रातः सन्ध्या: प्रातः 05:25 बजे से 06:31 बजे तक
- अभिजित मुहूर्त: दोपहर 12:37 बजे से 01:29 बजे तक
- गोधूलि मुहूर्त: शाम 07:36 बजे से 07:57 बजे तक
- सायाह्न सन्ध्या: शाम 07:36 बजे से रात 08:41 बजे तक
विशेष नोट: कोकिला व्रत में प्रदोष काल की पूजा का सबसे अधिक महत्व माना जाता है। 28 जुलाई को प्रदोष काल शाम 7:13 बजे से रात्रि 9:20 बजे तक रहेगा।
कोकिला व्रत की पूजा विधि
व्रत का पूर्ण फल प्राप्त करने के लिए निम्नलिखित विधि से पूजा संपन्न करें:
- स्नान: प्रातःकाल उठकर किसी पवित्र नदी में स्नान करें। यदि यह संभव न हो, तो घर पर ही नहाने के पानी में थोड़ा सा गंगाजल मिलाकर स्नान करें।
- मूर्ति स्थापना: शुद्ध मिट्टी से एक कोयल (कोकिला) की आकृति बनाएं और उसे अपने घर के पूजा स्थल के पास स्थापित करें।
- सामग्री अर्पण: कोयल रूपी माता सती को साफ वस्त्र, सुहाग की श्रृंगार सामग्री, धूप, दीप और ताजे पुष्प अर्पित करें।
- मंत्र जाप व कथा: भगवान शिव और माता पार्वती के सिद्ध मंत्रों का श्रद्धापूर्वक जाप करें। इसके साथ ही कोकिला व्रत की पावन कथा का पाठ अवश्य करें।
- आरती: कथा समाप्त होने के बाद अंत में माता सती और शिव जी की आरती गाकर पूजा संपन्न करें।
व्रत का धार्मिक महत्व
- सुहागिन स्त्रियों के लिए: यह व्रत अखंड सौभाग्य, पारिवारिक सुख और जीवन के कष्टों को दूर करने के लिए रखा जाता है।
- अविवाहित कन्याओं के लिए: कुंवारी कन्याएं यदि इस दिन व्रत रखकर भगवान शिव और माता सती की पूजा करती हैं, तो उन्हें मनचाहे और योग्य वर की प्राप्ति होती है।


























































