29 जून 2026 को ज्येष्ठ माह की पूर्णिमा मनाई जाएगी, जिसे ‘वट सावित्री पूर्णिमा’ या ‘वट पूर्णिमा व्रत’ के रूप में भी जाना जाता है। यह दिन सुहागिन महिलाओं के लिए अत्यंत विशेष होता है। इस दिन महिलाएं अपने पति की लंबी आयु, उत्तम स्वास्थ्य और अखंड सौभाग्य की प्राप्ति के लिए निर्जला व्रत रखती हैं।
उत्तर भारत में वट सावित्री का व्रत ज्येष्ठ अमावस्या को रखा जाता है, जबकि महाराष्ट्र, गुजरात और दक्षिण भारत के कई हिस्सों में यह व्रत ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन पूरे विधि-विधान से मनाया जाता है।
वट वृक्ष और पूजा का धार्मिक महत्व
वट पूर्णिमा के दिन बरगद (वट) के पेड़ की पूजा का विशेष विधान है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार:
- वट वृक्ष में त्रिदेव (ब्रह्मा, विष्णु और महेश) का वास माना जाता है।
- इस पवित्र वृक्ष की पूजा करने से एक साथ सभी प्रमुख देवताओं का आशीर्वाद प्राप्त होता है।
- सुहागिन महिलाएं वट वृक्ष की परिक्रमा करते हुए माता सावित्री से अपने वैवाहिक जीवन में सुख-शांति और पति की दीर्घायु की प्रार्थना करती हैं।
वट पूर्णिमा व्रत 2026: शुभ मुहूर्त
पंचांग के अनुसार, इस वर्ष ज्येष्ठ शुक्ल पूर्णिमा की तिथियां और पूजा के शुभ मुहूर्त इस प्रकार रहेंगे:
- पूर्णिमा तिथि का आरंभ: 29 जून 2026, मध्यरात्रि 3 बजकर 6 मिनट पर
- पूर्णिमा तिथि का समापन: 30 जून 2026, सुबह 5 बजकर 26 मिनट पर
- ब्रह्म मुहूर्त: सुबह 4 बजकर 38 मिनट से सुबह 5 बजकर 21 मिनट तक
- अभिजित मुहूर्त: दोपहर 12 बजकर 15 मिनट से दोपहर 1 बजकर 8 मिनट तक
(नोट: पूजा-पाठ के लिए ब्रह्म मुहूर्त और अभिजित मुहूर्त को अत्यंत फलदायी माना जाता है।)
वट सावित्री पूर्णिमा: संपूर्ण पूजा विधि
व्रत का पूर्ण फल प्राप्त करने के लिए नीचे दी गई पूजा विधि का पालन करें:
- स्नान और वस्त्र: प्रात:काल जल्दी उठकर स्नान करें। पूजा के लिए लाल, गुलाबी, पीला या नारंगी जैसे शुभ रंगों के साफ वस्त्र ही धारण करें। काले या सफेद कपड़े पहनने से बचें।
- सोलह श्रृंगार और संकल्प: स्नान के बाद पूर्ण रूप से 16 श्रृंगार करें और हाथ में जल लेकर निर्जला व्रत का संकल्प लें।
- पूजा की डलिया तैयार करें: बांस से बनी एक साफ डलिया लें। इसमें सात प्रकार के अनाज, ताजे फूल, फल, रोली, सिंदूर, कच्चा सूत, धूप-दीप, बांस का पंखा और सुहाग (श्रृंगार) की संपूर्ण सामग्री सजाएं।
- प्रतिमा स्थापना: किसी पवित्र वट वृक्ष (बरगद के पेड़) के नीचे जाएं। वहां साफ-सफाई करके माता सावित्री और सत्यवान की तस्वीर या मूर्ति स्थापित करें।
- सामग्री अर्पण: डलिया में लाई गई सभी पूजा सामग्री माता सावित्री और वट वृक्ष को अर्पित करें। बांस के पंखे से उन्हें हवा करें।
- वृक्ष की परिक्रमा: वट वृक्ष की 11, 21, 51 या 108 बार परिक्रमा करें। परिक्रमा करते समय पेड़ के तने पर ‘कच्चा सूत’ (सफेद या लाल धागा) लपेटें और मन में पति की लंबी आयु की प्रार्थना करें।
- व्रत कथा का श्रवण: परिक्रमा के बाद वहीं बैठकर सावित्री और सत्यवान की कथा अवश्य पढ़ें या सुनें। मान्यता है कि कथा सुने बिना इस व्रत का पूर्ण फल प्राप्त नहीं होता।
- आशीर्वाद: पूजा संपन्न होने के बाद घर आएं। अपने पति के चरण स्पर्श कर उनका आशीर्वाद लें और उन्हें बांस के पंखे से हवा करें। ब्राह्मणों या जरूरतमंदों को दान-दक्षिणा देना भी शुभ माना जाता है।





































