आधुनिक जीवनशैली, खान-पान की बिगड़ी आदतों और शारीरिक निष्क्रियता के कारण डायबिटीज टाइप-2 (Diabetes Type-2) आज वैश्विक स्तर पर एक गंभीर स्वास्थ्य चुनौती बन चुकी है। पूर्व में यह माना जाता था कि डायबिटीज केवल अधेड़ उम्र या बुजुर्ग व्यक्तियों को प्रभावित करती है, परंतु वर्तमान समय में युवा और किशोर भी तेजी से इसकी चपेट में आ रहे हैं।
डायबिटीज को अक्सर एक ‘साइलेंट किलर’ (Silent Killer) कहा जाता है, क्योंकि इसके शुरुआती लक्षण बहुत सामान्य महसूस होते हैं जिन्हें लोग प्रायः सामान्य थकान या तनाव समझकर नजरअंदाज कर देते हैं। यद्यपि डायबिटीज स्वयं तुरंत जानलेवा नहीं होती, परंतु यदि लंबे समय तक रक्त में शर्करा का स्तर (Blood Sugar Level) अनियंत्रित रहे, तो यह शरीर के प्रमुख आंतरिक अंगों को गंभीर क्षति पहुँचाकर जीवन के लिए संकट उत्पन्न कर सकती है। आइए, 13 अगस्त 2026 के इस विशेष स्वास्थ्य आलेख में विस्तार से समझते हैं कि डायबिटीज कब और किन परिस्थितियों में अत्यंत घातक सिद्ध हो सकती है तथा इससे बचाव के क्या उपाय हैं।
डायबिटीज कब जानलेवा हो सकती है?
इंटरनल मेडिसिन विशेषज्ञों के अनुसार, डायबिटीज अचानक से जानलेवा रूप धारण नहीं करती। इसके घातक होने के पीछे लंबे समय तक क्रोनिक रूप से बढ़ा हुआ ब्लड शुगर या फिर अचानक से शुगर का बहुत अधिक बढ़ जाना अथवा अत्यधिक गिर जाना (हाइपोग्लाइसीमिया) मुख्य कारण होता है।
जब शरीर में शर्करा का स्तर लंबे समय तक बढ़ा रहता है, तो यह हमारी रक्त वाहिकाओं (Blood Vessels) और तंत्रिका तंत्र (Nervous System) को धीरे-धीरे नुकसान पहुँचाने लगता है। इसके दुष्परिणामस्वरूप शरीर के अति महत्वपूर्ण अंगों पर सीधा प्रभाव पड़ता है:
- हृदय रोग व हार्ट अटैक: अनियंत्रित ब्लड शुगर से धमनियों में रुकावट आने लगती है, जिससे कोरोनरी आर्टरी डिजीज, हार्ट अटैक और कार्डियक अरेस्ट का जोखिम कई गुना बढ़ जाता है।
- स्ट्रोक (मस्तिष्क का दौरा): मस्तिष्क तक रक्त पहुँचाने वाली नलिकाओं में क्षति होने से स्ट्रोक का खतरा रहता है।
- किडनी फेल्योर (गुर्दे की खराबी): उच्च शर्करा के कारण किडनी की बारीक छनन नलिकाएं क्षतिग्रस्त हो जाती हैं, जिससे अंततः किडनी फेल्योर हो सकता है और मरीज को डायलिसिस या ट्रांसप्लांट की आवश्यकता पड़ सकती है।
- दृष्टिहीनता (आंखों की समस्या): डायबिटीज के कारण ‘डायबिटिक रेटिनोपैथी’ जैसी गंभीर समस्या उत्पन्न हो सकती है, जिससे आंखों की रोशनी पूरी तरह जा सकती है।
डायबिटीज की इमरजेंसी स्थिति
डायबिटीज के मरीजों में अचानक से दो प्रकार की गंभीर मेडिकल इमरजेंसी (Acute Emergencies) विकसित हो सकती हैं, जिनमें यदि तुरंत चिकित्सकीय देखभाल न मिले तो स्थिति जानलेवा हो सकती है:
1. डायबिटिक कीटोएसिडोसिस (DKA)
जब शरीर में इंसुलिन की भारी कमी हो जाती है, तो कोशिकाएं ऊर्जा के लिए ग्लूकोज का उपयोग नहीं कर पातीं। ऐसे में शरीर वसा (Fat) को तेजी से तोड़ना शुरू कर देता है, जिससे रक्त में ‘कीटोन्स’ नामक जहरीले एसिड बनने लगते हैं। इसके मुख्य लक्षण:
- अत्यधिक प्यास लगना और बार-बार पेशाब आना
- सांसों से फल जैसी या फ्रूटी गंध आना
- पेट में तेज दर्द, मिचली और लगातार उल्टी होना
- सांस लेने में भारी तकलीफ होना
2. हाइपरओस्मोलर हाइपरग्लाइसीमिक स्टेट (HHS)
यह स्थिति विशेष रूप से लंबे समय से टाइप-2 डायबिटीज से पीड़ित बुजुर्ग मरीजों में देखी जाती है। इसमें ब्लड शुगर का स्तर अत्यधिक (अक्सर 600 mg/dL से ऊपर) चला जाता है, जिससे शरीर में भयंकर डिहाइड्रेशन (पानी की कमी) हो जाता है। इसके लक्षण:
- अत्यधिक कमजोरी और सुस्ती
- भ्रम की स्थिति (Confusion) या किसी बात का ध्यान न रहना
- अत्यधिक नींद आना या बेहोशी की हालत बनना
इन लक्षणों को न करें नजरअंदाज
यदि किसी डायबिटीज के मरीज या सामान्य व्यक्ति में निम्नलिखित लक्षण लगातार दिखाई दें, तो इन्हें साधारण थकान समझकर टालने की भूल कदापि न करें:
- अत्यधिक प्यास और सूखा मुंह: बार-बार पानी पीने के बाद भी प्यास शांत न होना।
- बार-बार मूत्रत्याग: विशेषकर रात के समय बार-बार पेशाब जाना।
- अचानक वजन घटना या अत्यधिक कमजोरी: बिना किसी प्रयास के वजन में तेजी से गिरावट आना।
- घाव का देर से भरना: शरीर पर लगी छोटी-सी चोट या कट का लंबे समय तक ठीक न होना।
- दृष्टि में धुंधलापन: देखने में अचानक से समस्या या धुंधलापन महसूस होना।
- हाथों-पैरों में सुन्नता या झनझनाहट: नसों के क्षतिग्रस्त होने के कारण पैरों के तलवों में जलन या सुन्नपन होना।
आवश्यक डॉक्टरी जांचें व देखभाल
डायबिटीज प्रबंधन का अर्थ केवल घर पर ग्लूकोमीटर से रोजाना एकाध बार शुगर की रीडिंग ले लेना मात्र नहीं है। एक स्वस्थ और सुरक्षित जीवन जीने के लिए डायबिटीज के मरीजों को निम्नलिखित नियमित जांचें और नियम अपनाने अनिवार्य हैं:
1. अनिवार्य प्रयोगशाला जांचें
- HbA1c टेस्ट: यह टेस्ट पिछले 3 महीनों के औसत ब्लड शुगर का सटीक आंकड़ा देता है। इसे प्रति 3 से 6 महीने में अवश्य कराना चाहिए।
- किडनी फंक्शन टेस्ट (KFT) व माइक्रोएल्ब्यूमिन: गुर्दों की कार्यक्षमता और स्थिति की जांच के लिए वर्ष में कम से कम एक बार यह टेस्ट कराएं।
- आंखों की जांच (Fundus Examination): रेटिना की सुरक्षा हेतु साल में एक बार नेत्र विशेषज्ञ से आंखों की संपूर्ण जांच कराएं।
- लिपिड प्रोफाइल व ECG: हृदय के स्वास्थ्य की नियमित निगरानी रखें ताकि कोलेस्ट्रॉल और दिल से जुड़ी समस्याओं का समय पर पता चल सके।
2. विशेष परिस्थितियों में सतर्कता
यदि मरीज किसी अन्य बीमारी जैसे संक्रमण, बुखार, दस्त या उल्टी से पीड़ित हो, या भोजन कम ले पा रहा हो, तो ऐसे समय में ब्लड शुगर की मॉनिटरिंग और भी अधिक बार (दिन में कई बार) की जानी चाहिए। बीमारी के दौरान शरीर में तनाव से संबंधित हार्मोन बढ़ते हैं, जो ब्लड शुगर के स्तर को अचानक बहुत ऊपर ले जा सकते हैं।
3. कब तुरंत इमरजेंसी अस्पताल पहुँचें?
यदि मरीज को लगातार उल्टी हो रही हो, सांस लेने में अत्यधिक कठिनाई हो, तेज सिरचक्कर या बेहोशी के लक्षण दिख रहे हों, अथवा अत्यधिक भ्रम की स्थिति बने, तो बिना एक मिनट का समय गंवाए मरीज को नजदीकी अस्पताल के आपातकालीन विभाग (Emergency Room) में ले जाएं। सही समय पर मिला डॉक्टरी उपचार मरीज की जान बचा सकता है।

















































