पूर्णिमा की रात दिखाई दिए थे 16 स्वप्न: प्राचीन धार्मिक मान्यताओं और स्वप्न फल की कथाओं में चन्द्रगुप्त मौर्य के 16 स्वप्नों का विशेष उल्लेख मिलता है। मान्यता के अनुसार, पूर्णिमा की रात्रि को सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य ने एक के बाद एक 16 स्वप्न देखे थे। इन स्वप्नों को लेकर उनके मन में जिज्ञासा हुई तो उन्होंने इनके फल के बारे में आचार्य भद्रबाहु से पूछा। आचार्य भद्रबाहु ने सभी स्वप्नों का अलग-अलग विश्लेषण किया और उनके आधार पर भविष्यवाणी की। इन स्वप्नों में हाथी, बैल, सिंह, मालाएं, लक्ष्मी, पूर्ण चन्द्रमा, सूर्य, कलश, मछलियां, सरोवर, समुद्र, सिंहासन, स्वर्ग का विमान, नागेन्द्र भवन, रत्नों की राशि और निर्धूम अग्नि शामिल थे। आचार्य के अनुसार, ये सभी स्वप्न आने वाले बालक के असाधारण व्यक्तित्व, धार्मिक प्रभाव और महान उपलब्धियों के संकेत थे।
हाथी, बैल और सिंह के स्वप्न का फल: आचार्य भद्रबाहु ने हाथी के स्वप्न का फल बताते हुए कहा था कि होने वाला पुत्र जगत का हित करने वाला होगा। देवता भी उसकी आराधना करेंगे और वह समस्त राजाओं में शिरोमणि के समान प्रतिष्ठा प्राप्त करेगा। उत्तम बैल का स्वप्न इस बात का संकेत था कि बालक समस्त लोक में श्रेष्ठ होगा और संसार में धर्मरूपी महान रथ का प्रवर्तन करने वाला बनेगा। इसी प्रकार सिंह के दर्शन का अर्थ बताया गया कि वह अनंत बलशाली होगा और अपने कर्मरूपी हाथियों का नाश करने वाला बनेगा। इन तीनों स्वप्नों को बालक की महान शक्ति, श्रेष्ठता, प्रभाव और धर्म के क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका से जोड़कर देखा गया था।
माला, लक्ष्मी और पूर्ण चन्द्रमा के स्वप्न का फल: चौथे स्वप्न में मालाएं दिखाई देने का अर्थ आचार्य भद्रबाहु ने बताया कि होने वाला बालक समीचीन धर्म का प्रवर्तक बनेगा। पांचवें स्वप्न में लक्ष्मी के दर्शन हुए थे। इसका फल बताते हुए उन्होंने कहा कि बालक सुमेरू पर्वत के मस्तक पर देवताओं द्वारा अभिषेक प्राप्त करेगा। छठे स्वप्न में पूर्ण चन्द्रमा दिखाई दिया था। आचार्य के अनुसार, यह संकेत था कि बालक सद्धर्मरूपी अमृत की वर्षा करके समस्त जीवों को आनंद प्रदान करेगा। इन स्वप्नों के माध्यम से बालक के धार्मिक प्रभाव, आध्यात्मिक प्रतिष्ठा और संसार के जीवों के कल्याण में योगदान की भविष्यवाणी की गई थी।
सूर्य, कलश और मीनयुगल के स्वप्न का फल: सातवें स्वप्न में सूर्य के दर्शन हुए थे। इसका अर्थ बताया गया कि बालक अज्ञानरूपी अंधकार को नष्ट करने वाला होगा और अपने शरीर की कांति से आकाश को प्रकाशित करने की क्षमता रखेगा। आठवें स्वप्न में कलशों का जोड़ा दिखाई दिया था। आचार्य भद्रबाहु ने इसका फल बताते हुए कहा कि बालक नौ निधियों का भोक्ता होगा। नौवें स्वप्न में मीनयुगल अर्थात मछलियों का जोड़ा दिखाई दिया था। इस स्वप्न से यह संकेत मिलता था कि बालक मनुष्य और देवताओं से संबंधित भोगों के सुख का अनुभव करेगा। इन तीनों स्वप्नों को ज्ञान के प्रकाश, समृद्धि और सुख-संपन्नता का प्रतीक माना गया था।
सरोवर, समुद्र और सिंहासन के स्वप्न का फल: दसवें स्वप्न में सरोवर के दर्शन हुए थे। आचार्य के अनुसार, इसका संकेत था कि बालक 1008 लक्षणों से परिपूर्ण होगा और उसे अवधिज्ञान प्राप्त होगा। ग्यारहवें स्वप्न में समुद्र दिखाई दिया था। इसका फल बताते हुए उन्होंने कहा कि बालक सम्यग्दर्शन, केवलज्ञान आदि आध्यात्मिक रत्नों का सागर होगा। बारहवें स्वप्न में सिंहासन के दर्शन हुए थे। इसकी व्याख्या करते हुए आचार्य भद्रबाहु ने भविष्यवाणी की कि बालक जगद्गुरु बनेगा और साम्राज्य प्राप्त करेगा। इन तीनों स्वप्नों को असाधारण आध्यात्मिक ज्ञान, धार्मिक महानता और सर्वोच्च प्रतिष्ठा से संबंधित माना गया था।
स्वर्ग का विमान, नागेन्द्र भवन, रत्न राशि और निर्धूम अग्नि के स्वप्न का फल: तेरहवें स्वप्न में स्वर्ग का विमान दिखाई दिया था। आचार्य भद्रबाहु ने इसका अर्थ बताया कि बालक स्वर्ग से अवतीर्ण होगा। चौदहवें स्वप्न में नागेन्द्र भवन के दर्शन हुए थे, जिसका फल यह बताया गया कि बालक अवधिज्ञान से युक्त होगा। पंद्रहवें स्वप्न में रत्नों की राशि दिखाई दी थी। इसके अनुसार, बालक दर्शन, ज्ञान आदि गुणों की खान होगा। सोलहवें और अंतिम स्वप्न में बिना धुएं वाली अग्नि दिखाई दी थी। आचार्य ने इसकी व्याख्या करते हुए कहा कि बालक निश्चित रूप से शुक्लध्यानरूपी अग्नि के माध्यम से समस्त कर्मराशि को भस्म करने वाला होगा। इस प्रकार आचार्य भद्रबाहु ने चन्द्रगुप्त मौर्य के सभी 16 स्वप्नों का फल बताते हुए बालक को धर्म, ज्ञान, शक्ति, आध्यात्मिक उपलब्धियों और महान प्रतिष्ठा से संपन्न होने की भविष्यवाणी की थी।















































