निर्वासित ईस्ट तुर्किस्तान सरकार ने एक्स (X) पर पोस्ट किए गए एक कड़े बयान में अपना गुस्सा जाहिर किया है। संगठन ने तुर्की और चीन की नई कूटनीतिक मिठास को अल्पसंख्यकों के साथ एक बहुत बड़ा धोखा करार दिया है। उनका कहना है कि यह नई बातचीत दशकों से चले आ रहे धोखे की कड़ी में एक और निराशाजनक कदम है। उइगर, किर्गिज, कजाख और अन्य तुर्की मूल के लोगों को इस नए समझौते से भारी ठेस पहुंची है। इन समुदायों का मानना है कि उनके अपनों ने ही उन्हें एक बार फिर से भारी मुसीबत में धकेल दिया है।
औपनिवेशिक कब्जे और नरसंहार का आरोप निर्वासित सरकार ने अंतरराष्ट्रीय मंच पर चीन की क्रूर नीतियों को लेकर बहुत गंभीर आरोप लगाए हैं। उनके बयान के मुताबिक उइगर समुदाय के निर्दोष लोग ईस्ट तुर्किस्तान में चीन के भयानक नरसंहार का शिकार हो रहे हैं। इस क्षेत्र में चीनी प्रशासन द्वारा एक सोची-समझी औपनिवेशिक कब्जे की रणनीति अपनाई जा रही है। निर्दोष नागरिकों को उनके बुनियादी मानवाधिकारों से पूरी तरह से वंचित रखा जा रहा है। इस अमानवीय उत्पीड़न के खिलाफ आवाज उठाने वालों को चीनी सरकार द्वारा बेरहमी से कुचल दिया जाता है।
सुरक्षा मंत्री की भावुक अपील इस मुद्दे को लेकर निर्वासित सरकार के विदेश और सुरक्षा मंत्री सालेह हुदयार ने भी राजनयिक प्रयास तेज कर दिए हैं। उन्होंने हाल ही में अटलांटिक काउंसिल की तरफ से आयोजित एक कार्यक्रम के बाद तुर्की के अधिकारियों से संपर्क किया था। खबरों के अनुसार उन्होंने तुर्की के उप-विदेश मंत्री लेवेंट गुमरुकु के साथ एक बहुत ही अहम मीटिंग की थी। इस बैठक में सालेह हुदयार ने तुर्की से पूर्वी तुर्किस्तान की दबी हुई आवाज बनने का भावुक आग्रह किया था। उन्होंने यह भी मांग की थी कि तुर्की को चीन के साथ अपना खुफिया सहयोग तुरंत खत्म कर देना चाहिए।
लंबे समय का सुरक्षा समझौता निर्वासित सरकार का कड़ा दावा है कि चीन और तुर्की के बीच यह संदिग्ध सहयोग आज का नहीं बल्कि काफी पुराना है। उनके आधिकारिक दावों के अनुसार यह द्विपक्षीय खुफिया और सुरक्षा सहयोग साल 1996 से लगातार चल रहा है। इस लंबे समय से चले आ रहे समझौते ने ईस्ट तुर्किस्तान की आजादी के आंदोलन को भारी नुकसान पहुंचाया है। तुर्की की इसी मिलीभगत के कारण आजादी के आंदोलन की कड़ी निगरानी और क्रूर दमन को जबरदस्त बढ़ावा मिला है। यह पुराना सहयोग मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के लिए एक बहुत बड़ी और गंभीर चिंता का विषय बना हुआ है।
तुर्क लोगों की मातृभूमि निर्वासित ईस्ट तुर्किस्तान सरकार ने इतिहास का हवाला देते हुए अपने अधिकारों को लेकर एक मजबूत तर्क पेश किया है। उन्होंने दृढ़ता के साथ तर्क दिया है कि पूर्वी तुर्किस्तान हमेशा से ही तुर्क लोगों की सच्ची और वास्तविक मातृभूमि रहा है। इतिहास के पन्नों में दर्ज है कि चीन ने 1940 के दशक के अंत में इस शांत क्षेत्र पर भयानक हमला किया था। उसी अन्यायपूर्ण हमले के बाद ड्रैगन ने आजाद ईस्ट तुर्किस्तान पर पूरी तरह से अपना गैरकानूनी कब्जा जमा लिया था। तब से लेकर आज तक यह मातृभूमि अपनी खोई हुई आजादी को वापस पाने के लिए कड़ा संघर्ष कर रही है।
अपराध में मिलीभगत का आरोप निर्वासित सरकार ने मौजूदा वैश्विक कूटनीति के गिरते स्तर पर अपनी घोर निराशा भी खुले शब्दों में व्यक्त की है। संगठन के नेताओं ने कड़े शब्दों में कहा है कि तुर्की का यह नया कदम किसी भी तरह की डिप्लोमेसी नहीं है। उन्होंने इस तथाकथित सुरक्षा समझौते को सीधे तौर पर एक जघन्य अपराध में मिलीभगत करार दिया है। संगठन का साफ मानना है कि मानवाधिकारों की कीमत पर किया गया कोई भी समझौता नैतिक रूप से पूरी तरह गलत है। इस कड़े बयान के जरिए उन्होंने वैश्विक समुदाय का ध्यान इस अन्यायपूर्ण समझौते की तरफ खींचने की पुरजोर कोशिश की है।

























































