सर्वदलीय बैठक में तृणमूल कांग्रेस से अलग हुए बागी सांसदों के नए गुट ने पूरे आत्मविश्वास के साथ हिस्सा लिया। एनसीपीआई में शामिल हुईं टीएमसी की बागी सांसद काकोली घोष दस्तीदार भी इस महत्वपूर्ण बैठक में शिरकत करने पहुंचीं। बैठक स्थल पर पहुंचने के बाद केंद्रीय मंत्री किरेन रीजीजू और अर्जुन राम मेघवाल ने उनका बहुत ही गर्मजोशी से स्वागत किया। सत्ता पक्ष द्वारा बागी सांसदों को दिए गए इस सम्मान ने विपक्षी दलों के गुस्से को और भी ज्यादा भड़का दिया। इस घटनाक्रम से यह साफ हो गया कि सरकार इन बागी सांसदों को आधिकारिक तौर पर महत्व दे रही है।
बागी सांसद का स्पष्टीकरण: लोकसभा अध्यक्ष द्वारा बीस बागी सांसदों को अलग सीट आवंटित किए जाने के फैसले पर काकोली घोष दस्तीदार ने अपनी बात रखी। उन्होंने साफ तौर पर कहा कि वे सभी केवल देश और अपने राज्य के निरंतर विकास के लिए काम करना चाहते हैं। उनका तर्क है कि सभी बीस सदस्य सिर्फ यह चाहते हैं कि उनके निर्वाचन क्षेत्र का विकास बिल्कुल सही तरीके से हो। उन्होंने यह भी बताया कि वे लोग पहले भारी खतरे में थे और अब वे किसी भी तरह के खतरे में नहीं रहना चाहते। इसके समाधान के लिए उन्होंने आवेदन किया है और मांगे गए सभी जरूरी दस्तावेज भी लगातार जमा कर रहे हैं।
आम आदमी पार्टी का दर्द: तृणमूल कांग्रेस के इस विवाद के बीच आम आदमी पार्टी ने भी अपने साथ हुए कथित अन्याय का मुद्दा जोर-शोर से उठाया। आप सांसद एनडी गुप्ता ने बैठक के बाहर पत्रकारों से बातचीत करते हुए अपनी पार्टी की एक बहुत बड़ी परेशानी साझा की। उन्होंने कहा कि उनके मामले में भी राज्यसभा के दस में से सात सांसदों को पूरी तरह से हाईजैक कर लिया गया है। इस गंभीर मामले पर उनकी आधिकारिक याचिका अभी भी लंबित है लेकिन इसके बावजूद बागियों को राज्यसभा में अलग सीटें आवंटित कर दी गईं। एनडी गुप्ता ने सरकार के इस एकतरफा फैसले को सीधे तौर पर लोकतंत्र की सरेआम हत्या करार दिया है।
लोकतंत्र की हत्या का आरोप: इन सभी विवादों को लेकर विपक्षी नेताओं ने केंद्र सरकार पर संविधान की घोर अवहेलना करने का बहुत गंभीर आरोप लगाया है। टीएमसी और आप के मामलों को जोड़ते हुए विपक्ष का कहना है कि सत्ता पक्ष लोकतांत्रिक मूल्यों को लगातार कुचल रहा है। विपक्षी नेताओं के अनुसार बिना किसी कानूनी प्रक्रिया के बागियों को मान्यता देना संसदीय नियमों का पूरी तरह से उल्लंघन है। उनका यह भी मानना है कि इस तरह के असंवैधानिक कदम उठाकर सरकार विपक्ष की आवाज को कमजोर करने की कोशिश कर रही है। पूरे विपक्ष ने एक सुर में कहा है कि वे इस तरह की मनमानी और तानाशाही का हर स्तर पर कड़ा विरोध करेंगे।
स्पीकर के फैसले पर नजर: इस पूरे राजनीतिक घटनाक्रम में अब लोकसभा स्पीकर की भूमिका बेहद अहम और निर्णायक हो गई है। टीएमसी का दावा है कि इन बीस बागी सांसदों के एनसीपीआई में विलय को अभी तक स्पीकर की तरफ से मंजूरी नहीं मिली है। इन बागी सदस्यों की सदस्यता रद्द करने के लिए अयोग्यता की बीस अलग-अलग याचिकाएं भी स्पीकर के पास काफी समय से लंबित हैं। वहीं बागी गुट का दावा है कि उन्हें जरूरी जवाब मिल रहे हैं और कानूनी प्रक्रिया के तहत उनके दस्तावेज जमा हो रहे हैं। अब सभी की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि स्पीकर इस जटिल संवैधानिक मुद्दे पर अपना अंतिम फैसला क्या और कब सुनाते हैं।
विपक्ष की बैठक में वापसी: इतनी भारी बयानबाजी और जोरदार वॉकआउट के बावजूद विपक्षी दलों ने अंततः एक बहुत ही परिपक्व राजनीतिक कदम उठाया। सरकार के खिलाफ अपना कड़ा संदेश और रोष दर्ज कराने के बाद सभी विपक्षी नेता सर्वदलीय बैठक में वापस लौट आए। उन्होंने यह स्पष्ट किया कि उनका यह वॉकआउट सरकार की मनमानी के खिलाफ महज एक छोटा सा सांकेतिक विरोध प्रदर्शन था। वे नहीं चाहते कि इन विवादों के कारण मॉनसून सत्र की जरूरी कार्यवाही बाधित हो और जनता के अहम मुद्दे पीछे छूट जाएं। इसलिए जनता की भलाई और सदन की कार्यवाही को सुचारू रूप से चलाने के लिए विपक्ष ने बैठक का हिस्सा बने रहना ही उचित समझा।

























































