नई शिक्षा नीति के तहत लागू किए गए थ्री-लैंग्वेज फॉर्मूले का कड़ा विरोध शुरू हो गया है। अभिभावकों और स्कूलों ने इस नई प्रणाली को लागू करने में आ रही व्यावहारिक समस्याओं को उठाया है। अदालत में वकीलों ने बताया कि इस फैसले ने स्कूलों और छात्रों पर अचानक भारी बोझ डाल दिया है। रातों-रात एक नई भाषा सीखने का दबाव छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य पर असर डाल सकता है। इसके अलावा स्कूलों के पास इस नियम को लागू करने के लिए पर्याप्त समय भी नहीं बचा है।
बुनियादी ढांचे और संसाधनों की कमी वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने अदालत में छात्रों की व्यावहारिक परेशानियों को प्रमुखता से रखा। उन्होंने कक्षा नौवीं के एक चौदह वर्षीय छात्र का उदाहरण देते हुए स्थिति स्पष्ट की। उन्होंने कहा कि कोई बच्चा अगर अब तक अंग्रेजी और फ्रेंच पढ़ रहा था तो वह अचानक तमिल कैसे सीखेगा। अदालत के सामने यह सवाल उठाया गया कि नई भाषा सिखाने के लिए शिक्षक और बुनियादी ढांचा कहां से आएंगे। संसाधनों की इस भारी कमी के कारण नई नीति को लागू करना फिलहाल लगभग असंभव सा प्रतीत हो रहा है।
पाठ्यपुस्तकों की भारी किल्लत सीनियर एडवोकेट आनंद ग्रोवर ने पाठ्यपुस्तकों की कमी का मुद्दा बहुत ही मजबूती के साथ उठाया। उन्होंने बताया कि शिक्षा मंत्रालय के निर्देशानुसार एक राज्य ने एक जुलाई तक सभी किताबें उपलब्ध कराने को कहा है। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि कुल बाईस मान्यता प्राप्त भाषाओं में से केवल तीन की ही किताबें उपलब्ध हो पाई हैं। बिना किताबों के छात्रों को नई भाषाएं पढ़ाना किसी भी सूरत में संभव नहीं हो सकता है। यह स्थिति स्पष्ट करती है कि बिना किसी पूर्व तैयारी के यह नियम छात्रों पर थोपा जा रहा है।
शिक्षकों की कमी से जुड़ी समस्या नई भाषा नीति के सामने एक और बहुत बड़ी व्यावहारिक चुनौती योग्य शिक्षकों की कमी की है। वकीलों ने दलील दी कि यदि संस्कृत के बिना किसी छात्र को पंजाबी पढ़ानी हो, तो उसके लिए शिक्षक कहां से आएंगे। देश के कई स्कूलों में क्षेत्रीय भाषाओं को पढ़ाने के लिए प्रशिक्षित स्टाफ मौजूद ही नहीं है। उचित वैकल्पिक व्यवस्था दिए बिना नई भाषाओं को लागू करना शिक्षा की गुणवत्ता को बुरी तरह प्रभावित करेगा। शिक्षकों की इस कमी से निपटने के लिए फिलहाल सरकार की तरफ से कोई ठोस योजना नहीं बताई गई है।
शिक्षा के अधिकार कानून का उल्लंघन याचिकाकर्ताओं के वकीलों ने सीबीएसई के इस नए परिपत्र को पूरी तरह से अवैध करार दिया है। आनंद ग्रोवर ने दलील दी कि सरकार ऐसे परिपत्र लागू कर रही है जो सीधे तौर पर शिक्षा के अधिकार अधिनियम के विपरीत हैं। कक्षा छह और नौ के छात्रों के हितों की रक्षा करना इस समय सबसे बड़ी प्राथमिकता होनी चाहिए। बिना किसी विकल्प के छात्रों पर भाषाएं थोपना उनके कानूनी और शैक्षणिक अधिकारों का खुला हनन है। वकीलों ने अदालत से मांग की है कि इस अवैध परिपत्र पर तुरंत रोक लगाई जानी चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट का नोटिस और आदेश चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अगुवाई वाली तीन जजों की पीठ ने इन सभी गंभीर दलीलों पर ध्यानपूर्वक गौर किया। पीठ ने वरिष्ठ वकीलों की चिंताओं को सुनने के बाद केंद्र सरकार और शिक्षा बोर्ड को नोटिस जारी किया है। चीफ जस्टिस ने स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि सभी संबंधित पक्ष इस बीच अपना-अपना विस्तृत जवाब दाखिल करें। इस मामले पर अगली महत्वपूर्ण सुनवाई उनतीस जुलाई को तय की गई है। तब तक के लिए छात्रों और अभिभावकों की निगाहें अदालत के अगले कदम पर टिकी रहेंगी।


























































