महर्षि वेदव्यास द्वारा रचित अठारह महापुराणों में लिंग पुराण का अत्यंत विशिष्ट और ग्यारहवां स्थान है। यह पवित्र ग्रंथ मुख्य रूप से भगवान शिव की महिमा, उनके ज्योतिर्लिंगों की कथाओं और सृष्टि के गूढ़ रहस्यों को समर्पित है। शिव पुराण के पूरक ग्रंथ के रूप में विख्यात इस पुराण में कुल ११,००० श्लोक हैं। इसमें ईशान कल्प के वृत्तांत, सर्वविसर्ग आदि दस लक्षणों और योग व कल्प के विषयों का अत्यंत सूक्ष्म एवं दार्शनिक वर्णन किया गया है।
आइए, लिंग पुराण में वर्णित सृष्टि रचना, काल गणना और शिव तत्त्व के विस्तृत ज्ञान को गहराई से समझें।
१. ‘लिंग’ शब्द का वास्तविक और दार्शनिक अर्थ
आधुनिक समाज में ‘लिंग’ शब्द को लेकर कई भ्रांतियां व्याप्त हैं, किंतु शास्त्रों और पुराणों में इसका अर्थ अत्यंत व्यापक और पवित्र है।
- शाब्दिक अर्थ: ‘लिंग’ शब्द का शाब्दिक अर्थ ‘चिन्ह’ अथवा ‘प्रतीक’ होता है। महर्षि कणाद द्वारा रचित ‘वैशेषिक दर्शन’ में भी इसे इसी रूप में परिभाषित किया गया है।
- शिव की ज्योतिरूपा शक्ति: भगवान महेश्वर इस चराचर जगत के आदि पुरुष हैं। शिवलिंग वास्तव में उन्हीं भगवान शंकर की अनंत, ज्योतिरूपा और चिन्मय शक्ति का साक्षात प्रतीक है।
- ज्योतिर्लिंग का प्राकट्य: सृष्टि के कल्याण हेतु और ब्रह्मा व विष्णु जैसी अनादि शक्तियों का अहंकार दूर कर उन्हें आश्चर्यचकित करने के लिए भगवान शिव का एक विशाल ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रकट होना, इस पुराण का एक प्रमुख विषय है।
- उपासना का महत्व: इस ग्रंथ में मुक्ति प्रदान करने वाले विभिन्न व्रतों, शिवार्चन, योग, यज्ञ और हवनादि का विस्तृत विवेचन किया गया है, जो साधक को मोक्ष के मार्ग पर ले जाते हैं।
२. नैमिषारण्य में ज्ञान चर्चा: सूत जी और ऋषियों का संवाद
लिंग पुराण का ज्ञान पृथ्वी पर शौनक आदि ऋषियों के माध्यम से फैला। इसकी कथा इस प्रकार है:
एक बार देवर्षि नारद विभिन्न शिव तीर्थों और क्षेत्रों का भ्रमण करते हुए पवित्र नैमिषारण्य पहुँचे। वहाँ उपस्थित ऋषियों ने उनका भव्य स्वागत किया और लिंग पुराण के विषय में जानने की तीव्र जिज्ञासा प्रकट की। देवर्षि नारद ने उन्हें भगवान शिव की अनेक अद्भुत कथाएं सुनाईं।
उसी समय परम ज्ञानी सूत जी का वहाँ आगमन हुआ। ऋषियों और नारद जी ने उनका सत्कार किया और उनसे लिंग पुराण के गूढ़ रहस्यों को उद्घाटित करने का विशेष आग्रह किया। ऋषियों के आग्रह पर सूत जी ने ब्रह्मांड और शिव के स्वरूप का वर्णन निम्न प्रकार से किया:
- ब्रह्म और ॐ (ओम्): सूत जी ने बताया कि ‘शब्द’ ही ब्रह्म का शरीर है और वही उसका प्रकाशक भी है। ‘ओम्’ (ॐ) ही ब्रह्म का स्थूल, सूक्ष्म और परात्पर स्वरूप है।
- वेदों का स्वरूप: वेदों को ब्रह्म के शरीर के विभिन्न अंगों के रूप में दर्शाया गया है:
- ऋग्वेद: मुख
- सामवेद: जीभ
- यजुर्वेद: ग्रीवा (गर्दन)
- अथर्ववेद: हृदय
- त्रिदेव और निर्गुण महेश्वर: सत्, रज और तम—इन तीनों गुणों के आश्रय से ही परमात्मा ब्रह्मा, विष्णु और महेश के रूप में व्यक्त होता है। परंतु भगवान महेश्वर इन सभी से परे परम निर्गुण रूप हैं।
- ग्रंथ का इतिहास: मूल रूप से ईशान कल्प में ब्रह्मा जी ने १०० करोड़ श्लोकों वाले ग्रंथ की रचना की थी। बाद में महर्षि वेदव्यास जी ने इसे संक्षिप्त करके ४ लाख श्लोकों का किया और फिर उसे १८ महापुराणों में विभाजित किया, जिनमें से लिंग पुराण ग्यारहवें स्थान पर आता है।
३. सृष्टि की उत्पत्ति: प्राधानिक और वैकृतिक रचना
लिंग पुराण में सृष्टि के उद्भव का अत्यंत वैज्ञानिक और दार्शनिक वर्णन मिलता है। अदृश्य और निराकार शिव ही इस दृश्यमान प्रपंच (लिंग) का मूल कारण हैं।
- अलिंग शिव और प्रकृति: अव्यक्त पुरुष को ‘शिव’ (अलिंग) और अव्यक्त प्रकृति को ‘लिंग’ कहा गया है। शिव गंध, वर्ण, शब्द, स्पर्श और रूप से रहित होकर भी निर्गुण, ध्रुव और अक्षय हैं।
- सृष्टि का क्रम: परमात्मा सर्जन की इच्छा से जब अव्यक्त में प्रवेश करता है, तो ‘महत् तत्व’ की रचना होती है।
- अहंकार और तन्मात्राएं: महत् से त्रिगुणमयी ‘अहंकार’ (रजोगुण प्रधान) उत्पन्न होता है। इस अहंकार से पाँच तन्मात्राएं (सूक्ष्म तत्व) जन्म लेती हैं: शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गंध।
- इन्द्रियों की उत्पत्ति: सतोगुणी अहंकार से ५ ज्ञानेन्द्रियाँ, ५ कर्मेन्द्रियाँ और एक उभयात्मक ‘मन’—इस प्रकार कुल ११ तत्वों की उत्पत्ति होती है।
पंच महाभूतों की उत्पत्ति और उनके गुण:
तन्मात्राओं से ही पंच महाभूतों (स्थूल तत्वों) का निर्माण क्रमानुसार होता है। इसे निम्नलिखित तालिका से समझा जा सकता है:
| पंच महाभूत | उत्पत्ति का स्रोत (तन्मात्रा) | तत्व में विद्यमान गुण (Properties) |
| १. आकाश | शब्द से | केवल १ गुण: शब्द |
| २. वायु | आकाश/स्पर्श से | २ गुण: शब्द और स्पर्श |
| ३. अग्नि | वायु/रूप से | ३ गुण: शब्द, स्पर्श और रूप |
| ४. जल | अग्नि/रस से | ४ गुण: शब्द, स्पर्श, रूप और रस |
| ५. पृथ्वी | जल/गंध से | ५ गुण: शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गंध |
- ब्रह्मांड का स्वरूप: महत् तत्व से लेकर पृथ्वी तक के सारे तत्वों से ब्रह्मांड रूपी ‘अण्ड’ का निर्माण होता है। यह जल से घिरा है। जल को उसके दस गुने वायु ने, और वायु को उसके दस गुने आकाश ने घेर रखा है। ऐसे कोटि-कोटि ब्रह्मांड हैं और प्रत्येक में पृथक-पृथक त्रिदेव निवास करते हैं।
४. हिन्दू काल गणना और ब्रह्मांड का चक्र
लिंग पुराण में समय (काल) की अत्यंत सूक्ष्म गणना प्रस्तुत की गई है। ब्रह्मा का एक दिन ‘सृष्टि’ का समय है और उनकी एक रात ‘प्रलय’ का काल है।
काल गणना के महत्वपूर्ण तथ्य:
- ब्रह्मा का दिन और रात: ब्रह्मा के दिन में विश्वेदेवा, प्रजापति और ऋषिगण सृष्टि में स्थिर रहते हैं। रात्रि (प्रलय) होने पर सभी उसी में समा जाते हैं और प्रातः पुनः उत्पन्न होते हैं। ब्रह्मा का एक दिन ‘कल्प’ कहलाता है।
- मनु और अयन: १,००० चतुर्युग बीतने पर १४ मनु अपना काल पूरा करते हैं। सूर्य के उत्तरायण रहने तक देवताओं का दिन और दक्षिणायन रहने तक उनकी रात होती है।
- मानव और देव वर्ष का अनुपात:
- देवताओं के ३ माह = मनुष्यों के १०० माह।
- ३६० मानव वर्ष = देवताओं का १ वर्ष।
- ३,१०० मानव वर्ष = सप्तर्षियों का १ वर्ष।
- ३० वर्ष = १ दिव्य वर्ष।
युगों का विभाजन (दिव्य वर्षों में):
पुराण में वर्णित युगों की अवधि इस प्रकार है:
| युग का नाम | अवधि (दिव्य वर्षों में) |
| सतयुग | ४०,००० दिव्य वर्ष |
| त्रेतायुग | ८०,००० दिव्य वर्ष |
| द्वापरयुग | २०,००० दिव्य वर्ष |
| कलियुग | ६०,००० दिव्य वर्ष |
(इस प्रकार १,००० चतुर्युगों का एक कल्प होता है और ब्रह्मा के ८,००० वर्षों का एक ‘ब्रह्म युग’ होता है।)
५. प्रलय और नवीन सृष्टि का आरंभ
जब कल्प का अंत (प्रलय) होता है, तो महर्लोक के निवासी जनलोक में चले जाते हैं। समस्त विकार अपने मूल कारण में लीन हो जाते हैं। शिव की आज्ञा से विकारों का संहार होता है। गुणों की विषमता से सृष्टि होती है और गुणों की समानता आने पर प्रलय घटित होती है।
इस संपूर्ण प्रक्रिया में शिव हमेशा एक ही रहते हैं, जबकि ब्रह्मा और विष्णु अनेक उत्पन्न होते हैं। प्रलय काल में सब कुछ नष्ट हो जाने पर जल (नार) ही जल शेष रहता है। उस जल में शयन करने के कारण ही भगवान विष्णु को ‘नारायण’ कहा जाता है।
जब ब्रह्मा जी प्रातः निद्रा से उठते हैं और चारों ओर शून्य व जल देखते हैं, तो उनमें पुनः सृष्टि रचने की इच्छा जागृत होती है। तब भगवान विष्णु ‘वाराह रूप’ धारण करके रसातल से पृथ्वी का उद्धार करते हैं। वह नदियों, सागरों और पर्वतों को पूर्ववत स्थिर करते हैं। पृथ्वी को समतल बनाकर भूः, भुवः और महः आदि लोकों की रचना की प्रक्रिया फिर से आरंभ की जाती है।
इस प्रकार, लिंग पुराण हमें न केवल शिव भक्ति का मार्ग दिखाता है, बल्कि ब्रह्मांड की उत्पत्ति, उसके संचालन और उसके लय होने की अत्यंत वैज्ञानिक और दार्शनिक प्रक्रिया का भी बोध कराता है।





































