अमेरिकी संसद के निचले सदन द्वारा पारित किया गया यह नया युद्ध शक्ति प्रस्ताव अब औपचारिक रूप से ऊपरी सदन यानी सीनेट में भेजा जाएगा। यदि इस प्रस्ताव को वहां से भी पूरी मंजूरी मिल जाती है, तो यह ईरान के खिलाफ जारी अमेरिकी सैन्य अभियान को कानूनी रूप से सीमित कर देगा। मालूम हो कि पिछले महीने भी चार रिपब्लिकन सीनेटरों ने डेमोक्रेट्स के साथ मिलकर इसी तरह का एक संयुक्त प्रस्ताव सदन के पटल पर पेश किया था। हालांकि सीनेट को अभी अपने इस नए युद्ध शक्तियों के प्रस्ताव को पूरी तरह मंजूरी देने या इसे अस्वीकार करने के लिए अंतिम मतदान करना बाकी है। इस वोटिंग के बाद ही संसद के इस बड़े फैसले की वास्तविक कानूनी स्थिति स्पष्ट हो पाएगी।
रुबियो की कड़ी चेतावनी: अमेरिका के विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने बुधवार को हाउस फॉरेन अफेयर्स कमेटी की एक महत्वपूर्ण सुनवाई में गवाही देते हुए इस प्रस्ताव पर अपनी गंभीर चिंता जताई है। उन्होंने अपनी गवाही में चेतावनी देते हुए कहा कि अगर कांग्रेस इस युद्ध शक्तियों के प्रस्ताव को मंजूरी देती है, तो इसके बहुत गलत परिणाम सामने आ सकते हैं। उनके अनुसार ऐसा होने पर ईरानी नेतृत्व यह सोचेगा कि अब अमेरिकी प्रशासन के हाथ पूरी तरह से बंध चुके हैं। वे सोचेंगे कि अमेरिकी सेना अब उनके खिलाफ कोई भी बड़ी सैन्य कार्रवाई नहीं कर पाएगी, तो फिर वे हमारे साथ किसी भी तरह का राजनयिक समझौता क्यों करेंगे।
लेबनान पर भी विचार: इस रणनीतिक चेतावनी के बीच, इसी सप्ताह अमेरिकी सदन में लेबनान में जारी अमेरिकी सैन्य कार्रवाई को रोकने के लिए भी युद्ध शक्तियों से संबंधित एक अन्य प्रस्ताव पर विचार किए जाने की प्रबल संभावना जताई जा रही है। इन लगातार उठते कदमों से यह साफ है कि अमेरिकी संसद अब विदेशों में हो रहे सैन्य खर्चों और युद्धों पर पूरी तरह लगाम कसने के मूड में आ चुकी है। अमेरिकी करदाताओं के 100 अरब डॉलर से अधिक की बर्बादी को लेकर संसद के भीतर विपक्षी नेताओं का गुस्सा लगातार बढ़ता जा रहा है। वे इसे देश को कमजोर करने वाली और महंगाई बढ़ाने वाली एक बेहद लापरवाह नीति करार दे रहे हैं।
ईरान का आक्रामक रुख: 28 फरवरी को ईरान पर हुए हमले में अमेरिका के इज़राइल के साथ खुलकर शामिल होने के बाद से ही मध्य पूर्व में तनाव अपने चरम पर पहुंच गया था। इसके जवाब में ईरान ने जब होर्मुज के मार्ग को बंद किया, तो दुनिया भर में प्राकृतिक गैस, तेल और उर्वरक की भारी किल्लत पैदा हो गई। इस किल्लत के कारण अमेरिका के घरेलू बाजारों में पेट्रोल की कीमतों में भारी उछाल आया, जिसने आम अमेरिकी उपभोक्ताओं के बजट को पूरी तरह बिगाड़ कर रख दिया। हालांकि इस भारी दबाव के बाद अप्रैल में एक युद्धविराम की घोषणा की गई थी, लेकिन वह शांति व्यवस्था पूरी तरह अस्थायी और कमजोर साबित हुई है।
हिज़्बुल्लाह के कारण जटिलता: लेबनान में सक्रिय ईरान समर्थित हिज़्बुल्लाह आतंकवादियों के साथ इज़राइल के बढ़ते युद्ध ने इस पूरे मामले को और भी अधिक जटिल और संवेदनशील बना दिया है। इस त्रिकोणीय संघर्ष के कारण स्थायी शांति के लिए होने वाली अंतरराष्ट्रीय स्तर की बातचीत लगातार लंबी खिंचती जा रही है। इस राजनीतिक खींचतान के बीच अमेरिकी संविधान के नियमों को लेकर भी सरकार की विभिन्न शाखाओं के बीच एक बड़ा आंतरिक विवाद खड़ा हो गया है। संविधान जहां कांग्रेस को आधिकारिक रूप से युद्ध की घोषणा करने की शक्ति देता है, वहीं राष्ट्रपति को कमांडर-इन-चीफ के रूप में त्वरित सैन्य कार्रवाई करने का विशेषाधिकार प्रदान करता है।
प्रशासन का अपना तर्क: इस संवैधानिक टकराव के बीच, स्थापित युद्ध शक्ति अधिनियम के नियमों के तहत व्हाइट हाउस के पास किसी भी सैन्य कार्रवाई को जारी रखने के लिए कांग्रेस से औपचारिक अनुमोदन प्राप्त करने की 60 दिनों की एक अनिवार्य समय सीमा होती है। इस समय सीमा के मुद्दे पर ट्रंप प्रशासन ने पहले ही अपने इरादे साफ करते हुए संकेत दे दिए हैं। प्रशासन का कहना है कि चूंकि ईरान में चल रहे इस बड़े संघर्ष में पहले ही एक युद्धविराम की घोषणा की जा चुकी है, इसलिए वहां दोनों देशों के बीच शत्रुता अब व्यावहारिक रूप से समाप्त हो चुकी है। इस तर्क के सहारे प्रशासन इस प्रस्ताव की कानूनी अनिवार्यता को टालने की कोशिश कर रहा है।





































