अठारह प्रमुख पुराणों में ‘ब्रह्मवैवर्त पुराण’ को दसवां और अत्यंत प्राचीन पुराण माना गया है। यह मुख्य रूप से एक वैष्णव महापुराण है, जिसमें ब्रह्मांड के निर्माण, जीव की उत्पत्ति और भगवान श्रीकृष्ण तथा देवी राधा की गोलोक-लीलाओं का विस्तार से वर्णन किया गया है। इस ग्रंथ में भगवान श्रीकृष्ण को ही सृष्टि का मूल कारण और ‘परब्रह्म’ स्वीकार किया गया है। भागवत पुराण की तुलना में इस पुराण में श्रीकृष्ण की लीलाओं का वर्णन शृंगार रस से अधिक परिपूर्ण है।
अर्थ: ‘ब्रह्मवैवर्त’ का शाब्दिक अर्थ है— ब्रह्म का विवर्त अर्थात् ‘ब्रह्म की रूपान्तर राशि’ (प्रकृति)। जहां प्रकृति के विभिन्न परिणामों और परिवर्तनों का विस्तार से प्रतिपादन हो, वही पुराण ‘ब्रह्मवैवर्त’ कहलाता है।
महर्षि वेदव्यास जी द्वारा रचित इस महापुराण में कुल 18,000 श्लोक हैं। इसे मुख्य रूप से पांच खण्डों में विभाजित किया गया है:
पुराण के पांच प्रमुख खण्ड
- ब्रह्म खण्ड (30 अध्याय): इसमें सृष्टि क्रम और श्रीकृष्ण की लीलाओं का वर्णन है। भगवान कृष्ण के शरीर से ही सभी देवी-देवताओं का प्राकट्य बताया गया है। भगवान सूर्य द्वारा संकलित एक स्वतंत्र ‘आयुर्वेद संहिता’ और कृष्ण के वाम अंग से अर्द्धनारीश्वर स्वरूप में राधा जी के प्रकट होने का उल्लेख इसी खण्ड में है।
- प्रकृति खण्ड (67 अध्याय): यह खण्ड देवियों के प्राकट्य और उनकी शक्तियों को समर्पित है। इसमें यशोदुर्गा, महालक्ष्मी, सरस्वती, गायत्री, सावित्री और सर्वोपरि रासेश्वरी देवी राधा के चरित्रों का सुंदर विवरण मिलता है।
- गणपति खण्ड (46 अध्याय): इसमें भगवान गणेश के जन्म, पुण्यक व्रत की महिमा और शनिदेव की दृष्टि से गणेश जी का सिर कटने की प्रसिद्ध कथा है। श्रीहरि विष्णु द्वारा उन्हें हाथी का सिर लगाकर जीवित करने का प्रसंग भी इसमें है। इसमें बताया गया है कि गणेश जी की पूजा में ‘तुलसी दल’ कभी अर्पित नहीं करना चाहिए।
- श्रीकृष्ण जन्म खण्ड (133 अध्याय): यह पुराण का सबसे बड़ा खण्ड है। इसमें श्रीकृष्ण की जन्म लीला और रासलीला का विस्तार है। इसमें श्रीकृष्ण के 33 नाम, बलराम के 9 नाम और राधा जी के 16 नामों का उल्लेख किया गया है। इस खण्ड में ‘अन्नदान’ को दुनिया का सबसे बड़ा दान बताया गया है।
- काशी खण्ड (47 अध्याय): इस भाग में भगवान शिव की महिमा, पवित्र काशी नगरी का महत्व और दीपक की गुरु भक्ति का अद्भुत वर्णन किया गया है।
सृष्टि की उत्पत्ति और गोलोक धाम
ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार, इस अनंत विश्व में असंख्य ब्रह्मांड विद्यमान हैं और उन सभी के अपने-अपने ब्रह्मा, विष्णु और महेश हैं। इन सभी ब्रह्मांडों से सर्वोच्च स्थान पर ‘गोलोक’ स्थित है, जहां स्वयं परब्रह्म श्रीकृष्ण निवास करते हैं।
- सृष्टि निर्माण के समय सर्वप्रथम उनके वाम अंग से देवी राधा प्रकट हुईं।
- कृष्ण के दायें अंग से नारायण और वाम पार्श्व से पंचमुखी शिव का प्राकट्य हुआ।
- भगवान की नाभि से ब्रह्मा, वक्षस्थल से धर्म और मुख से देवी सरस्वती का आविर्भाव हुआ।
श्रीराधा-कृष्ण के भूतल पर अवतार की कथा
इस पुराण में राधा-कृष्ण के अवतार की एक विशिष्ट और रोचक कथा है। एक बार गोलोक में विरजा नामक सखी के प्रसंग को लेकर श्रीराधा को क्षोभ हुआ और उन्होंने प्रणयकोप में श्रीकृष्ण को कठोर शब्द कहे। गोप सुदामा द्वारा इसका विरोध करने पर, श्रीराधा ने उसे असुर (शंखचूड़) होने का शाप दे दिया। क्रोध में आकर सुदामा ने भी राधा जी को मानव रूप में जन्म लेने का शाप दे दिया।
- अयोनिजा रूप में जन्म: शाप के प्रभाव से सती राधा भूतल पर वृषभानु वैश्य और माता कलावती के घर अयोनिजा (बिना गर्भ के) रूप में प्रकट हुईं।
- छाया राधा का विवाह: बारह वर्ष की आयु में उनका विवाह ‘रायाण’ नामक वैश्य (जो गोलोक का गोप और भूतल पर कृष्ण का मामा था) से तय हुआ। तब श्रीराधा अपनी ‘छाया’ स्थापित करके अंतर्धान हो गईं। रायाण का विवाह उसी छाया-राधा से हुआ था।
- पुनर्मिलन: साक्षात राधा हमेशा श्रीकृष्ण के वक्षस्थल में ही वास करती थीं। पृथ्वी का भार उतारने के पश्चात, सौ वर्ष पूर्ण होने पर तीर्थ यात्रा के दौरान श्रीराधा और श्रीकृष्ण का पुनर्मिलन हुआ और वे वापस गोलोक धाम पधारे।
उपासना का सही विधान
पुराण के अनुसार, विद्वान पुरुष को सदैव पहले ‘राधा’ नाम का और उसके पश्चात ‘कृष्ण’ नाम का उच्चारण करना चाहिए। जो व्यक्ति इस क्रम को बदलता है या इन दोनों में भेदभाव करता है, वह पाप का भागी बनता है। कार्तिक पूर्णिमा के दिन रासमंडल में स्वयं श्रीकृष्ण ने श्रीराधा का पूजन किया था। यह महापुराण श्रीराधा-कृष्ण की असीम कृपा दिलाने वाला, पापों का नाश करने वाला और जीवन में सुख-संपत्ति प्रदान करने वाला है।





































