ब्रह्माण्ड पुराण हिंदू धर्म के अट्ठारह महापुराणों में से एक प्रमुख पुराण है। मध्यकालीन भारतीय साहित्य में इसे ‘वायवीय पुराण’ या ‘वायवीय ब्रह्माण्ड’ भी कहा गया है। मान्यता है कि ब्रह्माण्ड का वर्णन करने वाले वायु देव ने यह पुराण महर्षि वेदव्यास जी को सुनाया था। 12,000 श्लोकों वाले इस महापुराण में विश्व का पौराणिक भूगोल, खगोल विज्ञान, और अध्यात्म रामायण जैसे महत्वपूर्ण विषय समाहित हैं।
🔸 पुराण का विस्तार और संरचना
यह पुराण भविष्य कल्पों से युक्त है और इसे मुख्य रूप से चार पादों (चरणों) में विभाजित किया गया है:
- प्रक्रिया पाद
- अनुष पाद
- उपोद्घात पाद
- उपसंहार पाद
इन चारों पादों को मुख्य रूप से तीन भागों में बांटा गया है:
- पूर्व भाग: पहले दो पाद (प्रक्रिया और अनुष पाद)
- मध्यम भाग: तीसरा पाद (उपोद्घात पाद)
- उत्तर भाग: चौथा पाद (उपसंहार पाद)
खास बात: पुराणों के प्रामाणिक पांचों लक्षण ‘ब्रह्माण्ड पुराण’ में मिलते हैं। प्राचीन काल में भारतीय ऋषि इस पुराण को अपने साथ जावा द्वीप (वर्तमान इण्डोनेशिया) लेकर गए थे। वहां की प्राचीन ‘कवि-भाषा’ में इसका अनुवाद किया गया था, जो आज भी सुरक्षित और उपलब्ध है।
🔸 कथा और विषय वस्तु
इस पुराण के तीनों भागों में सृष्टि और ब्रह्माण्ड के अलग-अलग विषयों का गहराई से वर्णन किया गया है:
1. पूर्व भाग (प्रक्रिया और अनुष पाद)
- इसमें सबसे पहले कर्तव्य के उपदेश, नैमिषारण्य आख्यान, हिरण्यगर्भ की उत्पत्ति और लोकरचना का वर्णन है।
- कल्प, मन्वन्तर, मानव और रुद्र सृष्टि, महादेव की विभूति और अग्निविजय की कथा बताई गई है।
- भौगोलिक वर्णनों में जम्बू आदि सात द्वीपों, नीचे के पातालों, ऊपर के लोकों (भूर्भुवः आदि) और भारतवर्ष का विस्तृत परिचय है।
- ग्रहों की गति, शिव जी के ‘नीलकण्ठ’ नाम पड़ने की कथा, यज्ञों का प्रवर्त्तन और युगों के अनुसार प्रजा के लक्षणों का भी विश्लेषण किया गया है।
2. मध्य भाग (उपोद्घात पाद)
- इस भाग में सप्तऋषियों का वर्णन, प्रजापति वंश, और उनसे देवताओं की उत्पत्ति की कथा है।
- कश्यप की संतानें, पितृकल्प, श्राद्धकल्प, और वैवस्वत मनु की उत्पत्ति का निरूपण किया गया है।
- इसमें कई प्रमुख कथाएँ शामिल हैं: गान्धर्व निरूपण, इक्ष्वाकु और वृष्णि वंश का वर्णन, परशुराम चरित्र, देवासुर संग्राम की कथा, विष्णु माहात्म्य, और बलि वंश का निरूपण।
- साथ ही, कलियुग में होने वाले राजाओं के चरित्र के बारे में भी भविष्यवाणी की गई है।
3. उत्तर भाग (उपसंहार पाद)
- जो वैवस्वत मन्वन्तर की कथा पहले संक्षेप में थी, उसे यहां विस्तार से समझाया गया है।
- भविष्य के मनुओं की कथा और पाप कर्मों के परिणामस्वरूप मिलने वाले विभिन्न नरकों का विवरण दिया गया है।
- अंत में शिवधाम का वर्णन, सत्व आदि गुणों के आधार पर जीवों की तीन प्रकार की गतियों का निरूपण, और परब्रह्म परमात्मा के स्वरूप का तार्किक और आध्यात्मिक प्रतिपादन किया गया है।





































