15 जून 2026 को सोमवती अमावस्या मनाई जा रही है। सनातन धर्म में सोमवार के दिन पड़ने वाली अमावस्या को ‘सोमवती अमावस्या’ कहा जाता है और इसे अत्यंत पुण्य फलदायी माना गया है। इस दिन भगवान शिव, माता पार्वती और चंद्र देव की पूजा का विधान है। मान्यता है कि इस दिन व्रत-पूजन करने से जीवन के सभी कष्टों से मुक्ति मिलती है और ईश्वर की विशेष कृपा प्राप्त होती है। जब यह अमावस्या अधिकमास में पड़ती है, तो इसका महत्व कई गुना बढ़ जाता है। आइए जानते हैं इसकी पावन कथा और इस दिन किए जाने वाले महत्वपूर्ण नियमों के बारे में।
🔸 सोमवती अमावस्या की पावन व्रत कथा
प्राचीन काल में एक गरीब ब्राह्मण परिवार था। परिवार में ब्राह्मण दंपत्ति और उनकी एक सुंदर, संस्कारवान पुत्री रहती थी। गरीब होने के कारण कन्या का विवाह नहीं हो पा रहा था। एक दिन उस ब्राह्मण के घर एक साधु महाराज पधारे। कन्या के सेवाभाव से प्रसन्न होकर साधु ने उसे लंबी आयु का आशीर्वाद दिया, परंतु यह भी बताया कि इस कन्या के हाथ में विवाह की रेखा नहीं है।
यह सुनकर ब्राह्मण दंपत्ति बेहद चिंतित हो गए और उन्होंने साधु महाराज से उपाय पूछा। साधु महाराज ने ध्यान लगाकर बताया, “पास के एक गांव में ‘सोना’ नाम की एक पतिव्रता धोबिन अपनी बहू और बेटे के साथ रहती है। यदि यह कन्या उस धोबिन की सेवा करे और बदले में वह धोबिन अपनी मांग का सिंदूर इस कन्या को लगा दे, तो इसका वैधव्य योग मिट जाएगा और विवाह संपन्न हो जाएगा।”
माता-पिता के कहने पर कन्या अगले ही दिन से सुबह-सुबह अंधेरे में उठकर सोना धोबिन के घर जाती और चुपचाप घर का सारा काम (साफ-सफाई आदि) करके उनके जागने से पहले लौट आती। सोना धोबिन और उसकी बहू इस बात से हैरान थीं कि आखिर उनके घर का सारा काम अपने आप कैसे हो जाता है।
सच्चाई जानने के लिए दोनों ने निगरानी शुरू की। कई दिनों बाद उन्होंने देखा कि एक कन्या अंधेरे में मुंह ढके आती है और काम करके चली जाती है। जब कन्या जाने लगी, तो सोना धोबिन उसके पैरों पर गिर पड़ी और इसका कारण पूछा। कन्या ने उसे साधु महाराज वाली सारी बात सच-सच बता दी।
यह सुनकर सोना धोबिन कन्या को अपनी मांग का सिंदूर देने के लिए तैयार हो गई, भले ही उस समय उसका अपना पति अस्वस्थ था। जैसे ही सोना धोबिन ने अपनी मांग का सिंदूर कन्या की मांग में लगाया, उसी क्षण सोना धोबिन के पति की मृत्यु हो गई। धोबिन को जब यह पता चला, तो वह विचलित नहीं हुई। वह घर से बिना अन्न-जल ग्रहण किए निकली थी। रास्ते में उसे एक पीपल का पेड़ मिला।
संयोग से उस दिन सोमवती अमावस्या थी। उसने कन्या के घर से मिले पूए-पकवान की जगह ईंट के टुकड़ों से 108 बार भंवरी देकर पीपल के पेड़ की 108 परिक्रमा की और उसके बाद ही जल ग्रहण किया। विधि-विधान से किए गए इस सोमवती अमावस्या के व्रत और परिक्रमा के पुण्य प्रभाव से उसका मृत पति फिर से जीवित हो उठा।
🔸 सोमवती अमावस्या के दिन क्या करें? (Dos)
सोमवती अमावस्या का दिन दान-पुण्य, जप-तप और आध्यात्मिक कार्यों के लिए बेहद शुभ माना जाता है:
- गंगा स्नान: प्रात:काल उठकर पवित्र नदी में स्नान करें। यदि यह संभव न हो, तो घर पर ही नहाने के पानी में थोड़ा सा गंगाजल मिलाकर स्नान करें।
- अर्घ्य और अभिषेक: स्नान के बाद सूर्य देव को जल अर्पित करें। भगवान शिव का दूध और शहद से अभिषेक करें और माता पार्वती को सुहाग की सामग्री (सिंदूर, चूड़ियां आदि) चढ़ाएं।
- पीपल की पूजा: शाम के समय पीपल के पेड़ के नीचे सरसों के तेल का दीपक जलाएं और पेड़ की परिक्रमा करें।
- दान-पुण्य: इस दिन तिल, अन्न और वस्त्र का दान करना बहुत पुण्यदायी होता है।
- पितरों का तर्पण: दक्षिण दिशा की ओर मुख करके जल में काले तिल मिलाकर पितरों के नाम से तर्पण करें। इससे पितृ दोष से मुक्ति मिलती है और घर में खुशहाली आती है।
🔸 सोमवती अमावस्या के दिन क्या न करें? (Don’ts)
इस पावन दिन का पूर्ण फल प्राप्त करने के लिए कुछ विशेष बातों से बचना चाहिए:
- तामसिक भोजन से बचें: इस दिन घर में प्याज, लहसुन और मांस-मदिरा न तो बनाएं और न ही इनका सेवन करें। सात्विक भोजन ही ग्रहण करें।
- देर तक न सोएं: सुबह जल्दी उठें और सूर्यास्त के समय भी सोने से बचें। इस दिन बेवक्त सोने से घर में आर्थिक तंगी आ सकती है।
- क्रोध और निंदा से बचें: मन में किसी के प्रति गलत विचार न लाएं। वाद-विवाद, झगड़े और किसी का अपमान करने से बचें।
- ब्रह्मचर्य का पालन करें: सोमवती अमावस्या के दिन पूरी तरह से ब्रह्मचर्य के नियमों का पालन करना अनिवार्य माना जाता है।





































